Monday, October 30, 2017

मूल मंत्र ग्रन्थ

मूल मंत्र अर्थात् सार तत्व को अनुभव करने का मंत्र रूपी वाणी प्रारम्भ होती है।

निरंजन निरंजन निराकार भज रेताता न सीरा राता न पीरा।
धरौ ध्यान धीरारह्मा आप थिर रे ।।1।।
यह सत्गुरू गरीब दास साहिब जी की वाणी है। निरंजन जो इन आँखों से
देखने में नहीं आतामाया से रहितआकार से रहित, शुद्ध ब्रह्म है। हे जीव! तू
उसका ध्यान कर। वह पारब्रह्म न गर्म है न ठण्डा हैन लाल है न पीला है 
अर्थात् जोरंग रूप से परे है। वह प्रभु अपने स्वरूप में स्वयं ही विराजमान है।
 ऐसे प्रभु का हहृय में विश्वास धारण करके ध्यान कर।

अडोलं अबोलं अछेदं अभेदंपरे से परे रेकहो कौन हेरे ।
अगम अथाह दरियागया तूं बिसरि रे ।।2।।
सर्व व्यापक निराकार ब्रह्म न कभी डोलता हैन कभी बोलता हैन ही
उसका छेदन किया जा सकता है अर्थात् काटा नहीं जा सकता। न उसका कोई भेद
पा सकता है। वह प्रभु परे से परे है। उसके स्वरूप में कभी कोई बदलाव नहीं
आता। ऐसे प्रभु को इन आँखों से कौन देख सकता है। वह अगम अथाह समुद्र की
तरह है। हे प्राणी! तूने उसे क्यों विसार दिया है?

बिना मूल मौलाजो काला न धौलासुरति सिंधु सैलं।
करो दूर फैलंभजो क्यों न हरि रे ।।3।।
साहिब प्रभु बिना मूल है अर्थात् उसे कोई पैदा करने वाला नहीं है। वह प्रभु
स्वयं ही प्रकट है। उसका कोई काला या सफेद रंग नहीं है। हे प्राणी! अपने
 मन को संसार के विकारों से दूर करकेसुर्ति को प्रभु के शब्द में लीन
 करके तू उस हरि का भजन क्यों नहीं करता?

पशू तूं पतंगमभुवंगम विसासीदई देह नर रे।
रटो राम रमतारखो शील समताकरें तोहे अजर रे ।।4।।
हे प्राणी! तू चैरासी लाख के चक्कर में कभी पशु कभी कीट
पतंगाकभी साप आदि योनियों में भटकता रहा है। प्रभु ने कृपा करके तुझे अब
नर-देह दी है। इसलिए अब तू शील स्वभाव और समान दृष्टि रखते हुए अर्थात् इस
संसार में सबके साथ प्रेम भाव रखते हुए सब में रमे हुए राम का नाम जप।
जिससे तू चैरासी लाख योनियों में जन्म मरण के चक्कर से छूट जाए।

अलख नूर मेलागुरू कौन चेलाबजर काल डर रे।
शब्द में समानाअमाना अजोखंचलो क्यौं न घर रे ।।5।।
जो देखने में नहीं आताउस प्रकाश रूप अलख प्रभु के साथ जब जीवात्मा
का मेल हो जाता है तो उसे समस्त सृष्टि में उसी प्रभु का नूर दिखने के कारण
समानता की दृष्टि हो जाती है। कोई छोटा-बड़ा नहीं लगता और वज्र काल भी उससे
 डरता है। इसलिए हे प्राणी! उस अमान  अतुल रहितशब्द बह्म में अपनी सुर्ति
 को जोड़कर अपने निजधामजहा से तू बिछड़ा हैउस परम
 धाम को जाने का प्रयत्न क्यों नहीं करता?

मूल मंत्र गौहरायाभेद किन्हैं विरले जन पाया।
पिण्ड ब्रह्मण्ड से सिंधि न्यारीकुछ ऐसी ही धारना धारी ।।6।।
सत्गुरू गरीबदास महाराज जी कहते हैं कि यह हमने मूलमंत्र 
उच्चारण किया है। इसका भेद किसी विरले जिज्ञासू ने ही पाया है। ऐसे
 प्रभु की महिमा पिण्ड-ब्रह्मण्ड से निराली है। उसकी कुछ ऐसी ही रज़ा है 
जिसका भेद हरेक प्राणी नहीं जान सकता। किसी विरले को ही उसकी 
रज़ा से उसका कुछ भेद मिलता है।

दिल अंदर दीदारनहीं वार पार।
वज्र पौलि पट खोल्हिनहीं तोल मोल।
शब्द सिन्धु झलकैदास गरीब निज नूर पलकै ।।7।।
साहिब पारब्रह्म का अपने दिल ही में अनुभव होता है उसका कोई उरार-पार
नहीं हैन ही उसका कोई तोल-मोल किया जा सकता है। सत्गुरू गरीबदास
महाराज कहते हैं कि उस शब्द ब्रह्म का नूर समस्त सृष्टि में पल-पल में 
झलक रहा है। उसके नूर का अनुभव करने के लिए वज्र के 
समान अज्ञान रूपी परदे को दूर करो।



12 comments:

  1. Sat Sahib g
    Malik Tui he Tu Hai
    Bandishood Dhan Dhan hai

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  2. बंदी छोड़ कबीर भगवान की जय,,
    बंदी छोड़ सद्गुरू रामपाल जी महाराज जी की जय,,बंदी छोड़ गरीब दास जी महाराज जी की जय हो..
    सत् साहैब

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  3. बंदी छोड़ सतगुरु रामपाल जी महाराज की जय हो सत साहेब सभी भक्तों को दास का सत साहेब


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  4. बन्दी छोड़ सदगुरु रामपाल जी महाराज की जय हो🙏🙏
    बन्दी छोड़ कबीर परमेश्वर की जय हो 🙏 बन्दी छोड़ गरीब दाश जी महाराज की जय हो 🙏
    पढ़े अनमोल पुस्तक गायन गंगा ,हमारी वेब साइट पर.www. JagatGuruSantRampalJiMaharaj.org
    विजिट करे ,और देखे साधना टीवी पर साम को 7:30से8:30तक , सत् साहेब जी 🙏🙏

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  5. हमारे सभी धार्मिक ग्रन्थों व शास्त्रो में उस एक प्रभु/मालिक/रब/ खुदा/अल्लाह/राम/साहेब/गोड/परमेश्वर की प्रत्यक्ष नाम लिख कर महिमा गाई है कि वह एक मालिक/प्रभु कबीर साहेब है जो सतलोक में मानव सदृश स्वरूप में आकार में रहता है।

    अवश्य जानिये

    कौन ब्रह्मा का पिता है? कौन विष्णु की माँ? शंकर का दादा कौन है?
    शेराँवाली माता (दुर्गा अष्टंगी) का पति कौन है?
    हमको जन्म देने व मरने में किस प्रभु का स्वार्थ है?
    पूर्ण संत की क्या पहचान है?
    हम सभी आत्मायें कहाँ से आई हैं?
    ब्रह्मा, विष्णु, महेश किसकी भक्ति करते हैं?
    तीर्थ, व्रत, तर्पण एवं श्राद्ध निकालने से कोई लाभ है या नहीं? (गीतानुसार)
    समाधी अभ्यास (meditation), राम, हरे कृष्ण, हरि ओम, हंस, तीन व पाँच आदि नामों तथा वाहेगुरु आदि-आदि नामों के जाप से सुख एवं मुक्ति संभव है या नहीं?
    श्री कृष्ण जी काल नहीं थे। फिर गीता वाला काल कौन है?

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  6. आज कलियुग में भक्त समाज के सामने पूर्ण गुरु की पहचान करना सबसे जटिल प्रश्न बना हुआ है। लेकिन इसका बहुत ही लघु और साधारण–सा उत्तर है कि जो गुरु शास्त्रो के अनुसार भक्ति करता है और अपने अनुयाईयों अर्थात शिष्यों द्वारा करवाता है वही पूर्ण संत है। चूंकि भक्ति मार्ग का संविधान धार्मिक शास्त्र जैसे – कबीर साहेब की वाणी, नानक साहेब की वाणी, संत गरीबदास जी महाराज की वाणी, संत धर्मदास जी साहेब की वाणी, वेद, गीता, पुराण, कुरआन, पवित्र बाईबल आदि हैं। जो भी संत शास्त्रो के अनुसार भक्ति साधना बताता है और भक्त समाज को मार्ग दर्शन करता है तो वह पूर्ण संत है अन्यथा वह भक्त समाज का घोर दुश्मन है जो शास्त्रो के विरूद्ध साधना करवा रहा है। इस अनमोल मानव जन्म के साथ खिलवाड़ कर रहा है। ऐसे गुरु या संत को भगवान के दरबार में घोर नरक में उल्टा लटकाया जाएगा।

    उदाहरण के तौर पर जैसे कोई अध्यापक सलेबस (पाठयक्रम) से बाहर की शिक्षा देता है तो वह उन विद्यार्थियों का दुश्मन है।

    गीता अध्याय नं. 7 का श्लोक नं. 15
    न, माम्, दुष्कतिनः, मूढाः, प्रपद्यन्ते, नराधमाः,
    मायया, अपहृतज्ञानाः, आसुरम्, भावम्, आश्रिताः।।

    अनुवाद: माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे आसुर स्वभावको धारण किये हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करनेवाले मूर्ख मुझको नहीं भजते अर्थात् वे तीनों गुणों (रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शिव) की साधना ही करते रहते हैं।

    यजुर्वेद अध्याय न. 40 श्लोक न. 10 (संत रामपाल दास जी द्वारा भाषा-भाष्य)
    अन्यदेवाहुःसम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्, इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे।।10।।

    हिन्दी अनुवाद:- परमात्मा के बारे में सामान्यत निराकार अर्थात् कभी न जन्मने वाला कहते हैं। दूसरे आकार में अर्थात् जन्म लेकर अवतार रूप में आने वाला कहते हैं। जो टिकाऊ अर्थात् पूर्णज्ञानी अच्छी प्रकार सुनाते हैं उसको इस प्रकार सही तौर पर वही समरूप अर्थात् यथार्थ रूप में भिन्न-भिन्न रूप से प्रत्यक्ष ज्ञान कराते हैं।

    गीता अध्याय नं. 4 का श्लोक नं. 34
    तत्, विद्धि, प्रणिपातेन, परिप्रश्नेन, सेवया,
    उपदेक्ष्यन्ति, ते, ज्ञानम्, ज्ञानिनः, तत्वदर्शिनः।।

    अनुवाद: उसको समझ उन पूर्ण परमात्मा के ज्ञान व समाधान को जानने वाले संतोंको भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करनेसे उनकी सेवा करनेसे और कपट छोड़कर सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे परमात्म तत्व को भली भाँति जाननेवाले ज्ञानी महात्मा तुझे उस तत्वज्ञानका उपदेश करेंगे।

    संत रामपाल जी महाराज

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  7. हुक्का, शराब, बीयर, तम्बाखु, बीड़ी, सिगरेट, हुलास सुंघना, गुटखा, मांस, अण्डा, सुल्फा, अफीम, गांजा और अन्य नशीली चीजों का सेवन तो दूर रहा किसी को नशीली वस्तु लाकर भी नहीं देनी है। बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज इन सभी नशीली वस्तुओं को बहुत बुरा बताते हुए अपनी वाणी में कहते हैं कि -

    सुरापान मद्य मांसाहारी, गमन करै भोगैं पर नारी। सतर जन्म कटत हैं शीशं, साक्षी साहिब है जगदीशं।।
    पर द्वारा स्त्री का खोलै, सतर जन्म अंधा होवै डोलै। मदिरा पीवै कड़वा पानी, सत्तर जन्म श्वान के जानी।।
    गरीब, हुक्का हरदम पिवते, लाल मिलावैं धूर। इसमें संशय है नहीं, जन्म पिछले सूर।।1।।
    गरीब, सो नारी जारी करै, सुरा पान सौ बार। एक चिलम हुक्का भरै, डुबै काली धार।।2।।
    गरीब, सूर गऊ कुं खात है, भक्ति बिहुनें राड। भांग तम्बाखू खा गए, सो चाबत हैं हाड।।3।।
    गरीब, भांग तम्बाखू पीव हीं, सुरा पान सैं हेत। गौस्त मट्टी खाय कर, जंगली बनें प्रेत।।4।।
    गरीब, पान तम्बाखू चाब हीं, नास नाक में देत। सो तो इरानै गए, ज्यूं भड़भूजे का रेत।।5।।
    गरीब, भांग तम्बाखू पीव हीं, गोस्त गला कबाब। मोर मग कूं भखत हैं, देगें कहां जवाब।। 6।।

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  8. किसी प्रकार का कोई व्रत नहीं रखना है। कोई तीर्थ यात्रा नहीं करनी, न कोई गंगा स्नान आदि करना, न किसी अन्य धार्मिक स्थल पर स्नानार्थ व दर्शनार्थ जाना है। किसी मन्दिर व ईष्ट धाम में पूजा व भक्ति के भाव से नहीं जाना कि इस मन्दिर में भगवान है। भगवान कोई पशु तो है नहीं कि उसको पुजारी जी ने मन्दिर में बांध रखा है। भगवान तो कण–कण में व्यापक है। ये सभी साधनाएँ शास्त्रो के विरुद्ध हैं।

    ऐसे संतों की तलाश करो जो शास्त्रो के अनुसार पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की भक्ति करते व बताते हों। फिर जैसे वे कहे केवल वही करना, अपनी मन मानी नहीं करना।

    सामवेद संख्या नं. 1400 उतार्चिक अध्याय नं. 12 खण्ड नं. 3 श्लोक नं. 5(संत रामपाल दास द्वारा भाषा-भाष्य) :-
    भद्रा वस्त्रा समन्या3वसानो महान् कविर्निवचनानि शंसन्।
    आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागविर्देववीतौ।।5।।

    हिन्दी:- चतुर व्यक्तियों ने अपने वचनों द्वारा पूर्ण परमात्मा (पूर्ण ब्रह्म) की पूजा का सत्यमार्ग दर्शन न करके अमत के स्थान पर आन उपासना (जैसे भूत पूजा, पितर पूजा, श्राद्ध निकालना, तीनों गुणों की पूजा (रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शंकर) तथा ब्रह्म-काल की पूजा मन्दिर-मसजिद-गुरूद्वारों-चर्चों व तीर्थ-उपवास तक की उपासना) रूपी फोड़े व घाव से निकले मवाद को आदर के साथ आचमन करा रहे होते हैं। उसको परमसुखदायक पूर्ण ब्रह्म कबीर सहशरीर साधारण वेशभूषा में (‘‘वस्त्रा का अर्थ है वेशभूषा-संत भाषा में इसे चोला भी कहते हैं। जैसे कोई संत शरीर त्याग जाता है तो कहते हैं कि महात्मा तो चोला छोड़ गए।‘‘) सत्यलोक वाले शरीर के समान दूसरा तेजपुंज का शरीर धारण करके आम व्यक्ति की तरह जीवन जी कर कुछ दिन संसार में रह कर अपनी शब्द-साखियों के माध्यम से सत्यज्ञान को वर्णन करके पूर्ण परमात्मा के छुपे हुए वास्तविक सत्यज्ञान तथा भक्ति को जाग्रत करते हैं।

    गीता अध्याय नं. 16 का श्लोक नं. 23
    यः, शास्त्रविधिम्, उत्सज्य, वर्तते, कामकारतः, न, सः,
    सिद्धिम्, अवाप्नोति, न, सुखम्, न, पराम्, गतिम्।।

    अनुवाद: जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है वह न सिद्धि को प्राप्त होता है न परम गति को और न सुख को ही।

    गीता अध्याय नं. 6 का श्लोक नं. 16
    न, अति, अश्र्नतः, तु, योगः, अस्ति, न, च, एकान्तम्,
    अनश्र्नतः, न, च, अति, स्वप्नशीलस्य, जाग्रतः, न, एव, च, अर्जुन।।

    अनुवाद: हे अर्जुन! यह योग अर्थात् भक्ति न तो बहुत खाने वाले का और न बिल्कुल न खाने वाले का न एकान्त स्थान पर आसन लगाकर साधना करने वाले का तथा न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।

    पूजैं देई धाम को, शीश हलावै जो। गरीबदास साची कहै, हद काफिर है सो।।
    कबीर, गंगा काठै घर करै, पीवै निर्मल नीर। मुक्ति नहीं हरि नाम बिन, सतगुरु कहैं कबीर।।
    कबीर, तीर्थ कर-कर जग मूवा, उडै पानी न्हाय। राम ही नाम ना जपा, काल घसीटे जाय।।
    गरीब, पीतल ही का थाल है, पीतल का लोटा। जड़ मूरत को पूजतें, आवैगा टोटा।।
    गरीब, पीतल चमच्चा पूजिये, जो थाल परोसै। जड़ मूरत किस काम की, मति रहो भरोसै।।
    कबीर, पर्वत पर्वत मैं फिर्या, कारण अपने राम। राम सरीखे जन मिले, जिन सारे सब काम।।

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  9. किसी प्रकार की पितर पूजा, श्राद्ध निकालना आदि कुछ नहीं करना है। भगवान श्री कृष्ण जी ने भी इन पितरों की व भूतों की पूजा करने से साफ मना किया है। गीता जी के अध्याय नं. 9 के श्लोक नं. 25 में कहा है कि -

    यान्ति, देवव्रताः, देवान्, पितऋन्, यान्ति, पितव्रताः।
    भूतानि, यान्ति, भूतेज्याः, मद्याजिनः, अपि, माम्।

    अनुवाद: देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मतानुसार पूजन करने वाले भक्त मुझसे ही लाभान्वित होते हैं।

    बन्दी छोड़ गरीबदास जी महाराज और कबीर साहिब जी महाराज भी कहते हैं ।
    ‘गरीब, भूत रमै सो भूत है, देव रमै सो देव। राम रमै सो राम है, सुनो सकल सुर भेव।।‘‘

    इसलिए उस(पूर्ण परमात्मा) परमेश्वर की भक्ति करो जिससे पूर्ण मुक्ति होवे। वह परमात्मा पूर्ण ब्र सतपुरुष(सत कबीर) है। इसी का प्रमाण गीता जी के अध्याय नं. 18 के श्लोक नं. 46 में है।

    यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
    स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।46।।

    अनुवाद: जिस परमेश्वरसे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत् व्याप्त है, उस परमेश्वरकी अपने स्वाभाविक कर्मोंद्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धिको प्राप्त हो जाता है।।63।।

    गीता अध्याय नं. 18 का श्लोक नं. 62:--
    तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
    तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।62।।

    अनुवाद: हे भरतवंशोभ्द्रव अर्जुन! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परम शान्ति (संसारसे सर्वथा उपरति) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।

    सर्वभाव का तात्पर्य है कि कोई अन्य पूजा न करके मन-कर्म-वचन से एक परमेश्वर में आस्था रखना।

    गीता अध्याय नं. 8 का श्लोक नं. 22:--
    पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया।
    यस्यान्तः स्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम्।।22।।

    अनुवाद: हे पृथानन्दन अर्जुन! सम्पूर्ण प्राणी जिसके अन्तर्गत हैं और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, वह परम पुरुष परमात्मा तो अनन्यभक्तिसे प्राप्त होनेयोग्य है।

    अनन्य भक्ति का तात्पर्य है एक परमेश्वर (पूर्ण ब्रह्म) की भक्ति करना, दूसरे देवी-देवताओं अर्थात् तीनों गुणों (रजगुण-ब्रह्मा, सतगुण-विष्णु, तमगुण-शिव) की नहीं। गीता जी के अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 1 से 4:--

    गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 1
    ऊध्र्वमूलम्, अधःशाखम्, अश्वत्थम्, प्राहुः, अव्ययम्,
    छन्दांसि, यस्य, पर्णानि, यः, तम्, वेद, सः, वेदवित्।।1।।

    अनुवाद: ऊपर को जड़ वाला नीचे को शाखा वाला अविनाशी विस्तृत संसार रूपी पीपल का वृक्ष है, जिसके छोटे-छोटे हिस्से या टहनियाँ, पत्ते कहे हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो इस प्रकार जानता है। वह पूर्ण ज्ञानी अर्थात् तत्वदर्शी है।

    गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 2
    अधः, च, ऊध्र्वम्, प्रसृताः, तस्य, शाखाः, गुणप्रवृद्धाः, विषयप्रवालाः,
    अधः, च, मूलानि, अनुसन्ततानि, कर्मानुबन्धीनि, मनुष्यलोके।।2।।

    अनुवाद: उस वृक्षकी नीचे और ऊपर तीनों गुणों ब्रह्मा-रजगुण, विष्णु-सतगुण, शिव-तमगुण रूपी फैली हुई विकार काम क्रोध, मोह, लोभ, अहंकार रूपी कोपल डाली ब्रह्मा, विष्णु, शिव ही जीवको कर्मोमें बाँधने की भी जड़ें अर्थात् मूल कारण हैं तथा मनुष्यलोक, स्वर्ग, नरक लोक पृथ्वी लोक में नीचे (चैरासी लाख जूनियों में) ऊपर व्यस्थित किए हुए हैं।

    गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 3
    न, रूपम्, अस्य, इह, तथा, उपलभ्यते, न, अन्तः, न, च, आदिः, न, च,
    सम्प्रतिष्ठा, अश्वत्थम्, एनम्, सुविरूढमूलम्, असङ्गशस्त्रोण, दढेन, छित्वा।। 3।।

    अनुवाद: इस रचना का न शुरूवात तथा न अन्त है न वैसा स्वरूप पाया जाता है तथा यहाँ विचार काल में अर्थात् मेरे द्वारा दिया जा रहा गीता ज्ञान में पूर्ण जानकारी मुझे भी नहीं है क्योंकि सर्वब्रह्मण्डों की रचना की अच्छी तरह स्थिति का मुझे भी ज्ञान नहीं है इस अच्छी तरह स्थाई स्थिति वाला मजबूत स्वरूपवाले निर्लेप तत्वज्ञान रूपी दढ़ शस्त्र से अर्थात् निर्मल तत्वज्ञान के द्वारा काटकर अर्थात् निरंजन की भक्ति को क्षणिक जानकर। (3)

    गीता अध्याय नं. 15 का श्लोक नं. 4
    ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।
    तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रतत्ति प्रसता पुराणी।।4।।

    अनुवाद: उसके बाद उस परमपद परमात्मा की खोज करनी चाहिये। जिसको प्राप्त हुए मनुष्य फिर लौटकर संसारमें नहीं आते और जिससे अनादिकालसे चली आनेवाली यह सृष्टि विस्तारको प्राप्त हुई है, उस आदि पुरुष परमात्माके ही मैं शरण हूँ।

    इस प्रकार स्वयं भगवान श्री कृषण ने इन्द्र जो देवी-देवताओं का राजा है कि पूजा भी छुड़वा कर उस परमात्मा की भक्ति करने के लिए ही प्रेरणा दी थी। जिस कारण उन्होंने गोवर्धन पर्वत को उठा कर इन्द्र के कोप से ब्रज वासियों की रक्षा की।

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  10. कर्म कष्ट (संकट) होने पर कोई अन्य ईष्ट देवता की या माता मसानी आदि की पूजा कभी नहीं करनी है। न किसी प्रकार की बुझा पड़वानी है। केवल बन्दी छोड़ कबीर साहिब को पूजना है जो सभी दु:खों को हरने वाले संकट मोचन हैं।

    सामवेद संख्या न. 822 उतार्चिक अध्याय 3 खण्ड न. 5 श्लोक न. 8 (संत रामपाल दास द्वारा भाषा-भाष्य) :-
    मनीषिभिः पवते पूव्र्यः कविनर्भिर्यतः परि कोशां असिष्यदत्।
    त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरन्निन्द्रस्य वायुं सख्याय वर्धयन्।।8।।

    हिन्दी:-सनातन अर्थात् अविनाशी कबीर परमेश्वर हृदय से चाहने वाले श्रद्धा से भक्ति करने वाले भक्तात्मा को तीन मन्त्र उपेदश देकर पवित्र करके जन्म व मृत्यु से रहित करता है तथा उसके प्राण अर्थात् जीवन-स्वांसों को जो संस्कारवश अपने मित्र अर्थात् भक्त के गिनती के डाले हुए होते हैं को अपने भण्डार से पूर्ण रूप से बढ़ाता है। जिस कारण से परमेश्वर के वास्तविक आनन्द को अपने आशीर्वाद प्रसाद से प्राप्त करवाता है।

    कबीर, देवी देव ठाढे भये, हमको ठौर बताओ। जो मुझ(कबीर) को पूजैं नहीं, उनको लूटो खाओ।।
    कबीर, काल जो पीसै पीसना, जोरा है पनिहार। ये दो असल मजूर हैं, सतगुरु के दरबार।।

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  11. इन सभी प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए कृपया पढ़िए पुस्तक “ज्ञान गंगा” - तथा जगत गुरु रामपाल जी महाराज का सतसंग सुनिए और वेबसाइट देखिए

    https://www.jagatgururampalji.org/hi/creation-of-nature-universe

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