Monday, October 30, 2017

मूल मंत्र ग्रन्थ

मूल मंत्र अर्थात् सार तत्व को अनुभव करने का मंत्र रूपी वाणी प्रारम्भ होती है।

निरंजन निरंजन निराकार भज रेताता न सीरा राता न पीरा।
धरौ ध्यान धीरारह्मा आप थिर रे ।।1।।
यह सत्गुरू गरीब दास साहिब जी की वाणी है। निरंजन जो इन आँखों से
देखने में नहीं आतामाया से रहितआकार से रहित, शुद्ध ब्रह्म है। हे जीव! तू
उसका ध्यान कर। वह पारब्रह्म न गर्म है न ठण्डा हैन लाल है न पीला है 
अर्थात् जोरंग रूप से परे है। वह प्रभु अपने स्वरूप में स्वयं ही विराजमान है।
 ऐसे प्रभु का हहृय में विश्वास धारण करके ध्यान कर।

अडोलं अबोलं अछेदं अभेदंपरे से परे रेकहो कौन हेरे ।
अगम अथाह दरियागया तूं बिसरि रे ।।2।।
सर्व व्यापक निराकार ब्रह्म न कभी डोलता हैन कभी बोलता हैन ही
उसका छेदन किया जा सकता है अर्थात् काटा नहीं जा सकता। न उसका कोई भेद
पा सकता है। वह प्रभु परे से परे है। उसके स्वरूप में कभी कोई बदलाव नहीं
आता। ऐसे प्रभु को इन आँखों से कौन देख सकता है। वह अगम अथाह समुद्र की
तरह है। हे प्राणी! तूने उसे क्यों विसार दिया है?

बिना मूल मौलाजो काला न धौलासुरति सिंधु सैलं।
करो दूर फैलंभजो क्यों न हरि रे ।।3।।
साहिब प्रभु बिना मूल है अर्थात् उसे कोई पैदा करने वाला नहीं है। वह प्रभु
स्वयं ही प्रकट है। उसका कोई काला या सफेद रंग नहीं है। हे प्राणी! अपने
 मन को संसार के विकारों से दूर करकेसुर्ति को प्रभु के शब्द में लीन
 करके तू उस हरि का भजन क्यों नहीं करता?

पशू तूं पतंगमभुवंगम विसासीदई देह नर रे।
रटो राम रमतारखो शील समताकरें तोहे अजर रे ।।4।।
हे प्राणी! तू चैरासी लाख के चक्कर में कभी पशु कभी कीट
पतंगाकभी साप आदि योनियों में भटकता रहा है। प्रभु ने कृपा करके तुझे अब
नर-देह दी है। इसलिए अब तू शील स्वभाव और समान दृष्टि रखते हुए अर्थात् इस
संसार में सबके साथ प्रेम भाव रखते हुए सब में रमे हुए राम का नाम जप।
जिससे तू चैरासी लाख योनियों में जन्म मरण के चक्कर से छूट जाए।

अलख नूर मेलागुरू कौन चेलाबजर काल डर रे।
शब्द में समानाअमाना अजोखंचलो क्यौं न घर रे ।।5।।
जो देखने में नहीं आताउस प्रकाश रूप अलख प्रभु के साथ जब जीवात्मा
का मेल हो जाता है तो उसे समस्त सृष्टि में उसी प्रभु का नूर दिखने के कारण
समानता की दृष्टि हो जाती है। कोई छोटा-बड़ा नहीं लगता और वज्र काल भी उससे
 डरता है। इसलिए हे प्राणी! उस अमान  अतुल रहितशब्द बह्म में अपनी सुर्ति
 को जोड़कर अपने निजधामजहा से तू बिछड़ा हैउस परम
 धाम को जाने का प्रयत्न क्यों नहीं करता?

मूल मंत्र गौहरायाभेद किन्हैं विरले जन पाया।
पिण्ड ब्रह्मण्ड से सिंधि न्यारीकुछ ऐसी ही धारना धारी ।।6।।
सत्गुरू गरीबदास महाराज जी कहते हैं कि यह हमने मूलमंत्र 
उच्चारण किया है। इसका भेद किसी विरले जिज्ञासू ने ही पाया है। ऐसे
 प्रभु की महिमा पिण्ड-ब्रह्मण्ड से निराली है। उसकी कुछ ऐसी ही रज़ा है 
जिसका भेद हरेक प्राणी नहीं जान सकता। किसी विरले को ही उसकी 
रज़ा से उसका कुछ भेद मिलता है।

दिल अंदर दीदारनहीं वार पार।
वज्र पौलि पट खोल्हिनहीं तोल मोल।
शब्द सिन्धु झलकैदास गरीब निज नूर पलकै ।।7।।
साहिब पारब्रह्म का अपने दिल ही में अनुभव होता है उसका कोई उरार-पार
नहीं हैन ही उसका कोई तोल-मोल किया जा सकता है। सत्गुरू गरीबदास
महाराज कहते हैं कि उस शब्द ब्रह्म का नूर समस्त सृष्टि में पल-पल में 
झलक रहा है। उसके नूर का अनुभव करने के लिए वज्र के 
समान अज्ञान रूपी परदे को दूर करो।



1 comment:

  1. Sat Sahib g
    Malik Tui he Tu Hai
    Bandishood Dhan Dhan hai

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