आई सद्गुरु बंदीछोड़ गरीबदास साहिब जी की बाल्य अवस्था की एक दिव्य लीला का वर्णन करते हैं। जिसमें सतगुरु जी ने एक उजड़े हुए खेत को फिर से हरा-भरा कर दिया।
नौ वर्ष की कोमल आयु, मुख पर अद्भुत तेज अपार।
गऊ चराने निकल पड़े, पिताश्री बलराम जी के लाल।
संग सखाओं की मधुर टोली, अधरों पर मधु-सी मुस्कान।
छुड़ानी धाम की गलियों में, गूँजे सत् साहिब का गान।।