आई सद्गुरु बंदीछोड़ गरीबदास साहिब जी की बाल्य अवस्था की एक दिव्य लीला का वर्णन करते हैं। जिसमें सतगुरु जी ने एक उजड़े हुए खेत को फिर से हरा-भरा कर दिया।
नौ वर्ष की कोमल आयु, मुख पर अद्भुत तेज अपार।
गऊ चराने निकल पड़े, पिताश्री बलराम जी के लाल।
संग सखाओं की मधुर टोली, अधरों पर मधु-सी मुस्कान।
छुड़ानी धाम की गलियों में, गूँजे सत् साहिब का गान।।
बालक सब क्रीड़ा में खोए, सुध-बुध सब बिसराय।
मस्त खड़ी थी फसल खेत में, गऊएँ उसमें जाय।।
हरा-भरा जो खेत लहलहाता, क्षण भर में हुआ उजाड़।
पग-पग तले कुचल गई फसल, मानो टूट पड़ा पहाड़।।
साँझ ढली जब भोला किसान, अपने खेत पर आया।
मेहनत अपनी धूल में मिलती देख, हृदय उसका घबराया।
क्रोधित होकर नवाब झज्जर के, द्वारे दी पुकार।
"बलराम के पूत ने लूटा, मेरा जीवन आधार!"।।
नवाब ने भेजे सिपाही अपने, करने जाँच-पड़ताल।
पिताश्री बलराम जी खड़े विनय से, जोड़े कर करुणा भाल।।
"चलिए चलकर स्वयं देख लें, कितना हुआ नुकसान।
पाई-पाई अदा कर दूँगा, रख लूँ अपना मान"।।
उधर बालरूप सद्गुरु 'गरीबा' जी, चिंतित हुए पल माही।
अंतर्यामी ने पल भर में, रच दिया नया विधान।।
अपनी योगमाया प्रकट कर, प्रकृति रूप पलटाए।
उजड़े हुए उस खेत मध्य भी, नव अंकुर मुस्काए।।
जब अधिकारी खेत पहुँचे, विस्मित रह गए निहार।
लहलहाती बाजरे की बालें, झूम रहीं अपार।।
किसान अचंभित, अवाक खड़ा था, क्या उत्तर अब देवे—
"अभी तो सब नष्ट हुआ था, यह चमत्कार कैसा होवे!"।।
कोने में छिपे बालस्वरूप सद्गुरु जी , मंद-मंद मुस्काते।
पिता का मान बचाकर वे, निज गृह को लौट आते।।
सद्गुरु वाणी का आसरा लेकर, सत् साहिब का जाप करें।
प्रेम पाठी छुड़ानी वाले, प्रभु चरणों में आप धरें।।


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