Wednesday, October 12, 2016

गरीबदासीय वाणी-नित्य नियम का महत्व

सतगुरू श्री गरीबदास महाराज जी के जीवन-इतिहास को यदि गौर से देखें तो पता चलता है कि यह नित्य नियम पाठ की वाणी सतगुरु देव जी ने छोटी आयु में ही उच्चारण करके समस्त शिष्य संगत को उपदेश किया था कि इस वाणी का पाठ प्रतिदिन सुबह-शाम नियमित करो। उस समय से ही समस्त शिष्य संगत सुबह-शांम यह पाठ प्रतिदिन करते आ रहें हैं। सतगुरु देव जी की जीवन लीला से जुड़ी हुई एक कथा भी है कि एक बार दैवयोग से घोड़ों का व्यापार करने वाले कुछ व्यापारी लोग श्री छुडानी धाम आए। सतगुरु देव जी के दर्शन करके उन्हें आत्मिक शांति का अनुभव हुआ। दर्शन करके अति प्रसन्न हुए। अपने मन में उन्होंने सतगुरू देव जी को अपना गुरू-पीर मान लिया। जब छुडानी धाम से आगे चलनेे लगे तो उन्होंने इक्ट्ठे होकर सतगुरू देव जी के समक्ष प्रार्थना की कि महाराज जी! हमें कोई उपदेश बख्शीस करो जिससे हम अपना व्यापार-कारोबार करते हुए भी अपना मानव जन्म सफल कर लें। 



                      सतगुरू देव जी उनकी प्रार्थना सुनकर अति प्रसन्न हुए और उपदेश दिया कि हे हंसो! आपका कारोबार देश-विदेश में घूम-घूम कर व्यापार करने का है। व्यापार नेक नीयति, सच्चाई और संतोश से करते हुए नित्य नियम की वाणी का पाठ प्रतिदिन प्रातः व सायं नियम पूर्वक करते रहना। इस नियम को निभाने से ही आपका संसार में आना सफल हो जाएगा। सतगुरू देव जी के मुख से इस उपदेश को सुन कर उन्होंने हृदय में धारण कर लिया और प्रतिदिन नियमपूर्वक पाठ करने लगे। नित्य नियम की वाणी प्रेम पूर्वक पढ़ने मात्र से ही उनकी अन्तरात्मा शुद्ध हो गई। वे सतगुरू देव जी के हंस बन गए। इस पाठ से ही उनकी, उनके सामान और घोड़ों की रक्षा गुप्त शक्ति के रूप में सतगुरू जी उनके अंग-संग रह कर करने लगे। 


                            जीवन-इतिहास से पता चलता है कि सतगुरू जी के 125 शिष्य संत थे, जो पूर्ण ब्रहमज्ञानी थे। सबका नित्य नियम का पाठ बड़े ही प्रेम भाव से सस्वर करने का नियम था। एक महापुरूश भगवतीदास जी को ब्रहम बेदी की पहली एक पंक्ति का बारम्बार उच्चारण करने से ही ब्रहमज्ञान हो गया था। सतगुरू देव साहिब श्री गरीबदास महाराज जी के अवतार सतगुरू श्री ब्रहम सागर जी भूरी वाले महाराज, जिन्होंने साहिब जी की अमृतमयी वाणी को संसार में प्रचारित किया है, सतगुरू देव श्री गरीबदास जी के मुख से उच्चारित हुई नित्य-नियम वाणी की एक हस्तलिखित प्रति सदैव अपने पास रखते थे। वह हस्तलिखित कापी (प्रति) आज भी सतगुरू देव जी के निर्वाण स्थल श्री जलूर धाम में मंजी साहिब के भीतर सुषोभित है। सतगुरू ब्रहमसागर जी भूरी वालों का समस्त शिष्य संगत को आदेश था कि सतगुरू गरीबदास साहिब की अमृतमयी वाणी का नित्य नियम पाठ, प्रातःकाल में मंगलाचरण, ब्रहमबेदी, सतगुरू महिमा का पाठ आदि और सायं के समय संध्या आरती प्रतिदिन नियमपूर्वक करें। 


                                 सतगुरू जी यह वचन संगत में करते थे कि जो सेवक सतगुरू जी की वाणी का नित्य नियम पाठ प्रतिदिन नियमानुसार करता है, वह हमारा हंस है। उसकी रूह-आत्मा पर वाणी की छाप लगी हुई है। ऐसे हंस को हम अपने से दूर नहीं जाने देंगे। सतगुरू देव भूरी वालों की शिष्य मण्डली के संत प्रतिदिन तीन समय का नित्य-नियम पाठ करते थे। 

                                        गरीबदासीय नित्य नियम वाणी में सर्व प्रमुख मंगलाचरण है, जो अति महत्वपूर्ण है। मंगलाचरण पढ़कर शुरू करने से समस्त कार्य पूर्ण होते हैं। सतगुरू देव जी के मुख से सबसे पहले जो वाणी प्रकट हुई है, "नमो नमो सत्यपुरूष को, नमस्कार गुरू कीन्हीं" इस वचन में ही उपदेश का सार भरा हुआ है। मंगलाचरण के बाद गुरूदेव का अंग है, जिसमें अनेक प्रकार से गुरूदेव की महिमा का वर्णन है। 
          "ब्रहमबेदी" की वाणी बड़ी महत्वपूर्ण है, जो पारब्रहम प्रभु की स्तुति में उच्चरण की है।"सतगुरू महिमा" नामक प्रकरण में सतगुरू देव जी ने सच्चे सतगुरू की पहचान करवाई है। सतगुरू जी की महिमा का अनेक तरह से वर्णन है। भक्ति मार्ग के भेद को खोलकर (विस्तृत रूप में) बताया गया है। इसी तरह मूल मंत्र ग्रन्थ, सूरज गायत्री, गीता गायत्री और सातों वार की रमैनी है। 


                                               यह पाठ प्रतिदिन सुबह समय करने से प्राणी की आत्मा शुद्ध होती है। किसी भी प्रकार की गृहदशा प्राणी को दुःख नहीं देती। प्रातः कालीन पाठ में सर्व लक्ष्णा ग्रन्थ है। इसमें सतगुरू जी ने प्राणी को मानव जीवन में शुभ गुण धारण करने का उपदेश दिया है। शुभ गुणों वाली आत्मा ही सदगुरू के दरबार में जा सकती है। अन्न देव की आरती में अन्न देव की अनन्त महिमा का वर्णन है। अन्न देव को साहिब का ही रूप बताया गया है। अन्न देव का भोजन करके हर सेवक को अन्न देव की आरती अवष्य करनी चाहिए। 
            "असुर निकंदन रमैनी" नामक प्रकरण में सतगुरू देव जी ने पारब्रहम प्रभु की स्तुति के अतिरिक्त उसकी ही शक्तियों ब्रहमा, विश्णु, महेश, आदि माया, समस्त अवतार, सारे देवता, ऋषि-मुनि, सिद्ध-सन्त, भक्त और सत्यवादी राजा इत्यादि जितनी भी संसार को चलाने वाली प्रभु की गुप्त दैवी शक्तियाँ हैं, उन सबका आह्वान किया है। उस समय के अषान्त वातावरण को षान्त करने के लिए सद्गुरू जी ने दैवी शक्तियों का आह्वान किया है। आसुरी शक्तियों के दमन हेतु आहवान किया है। 
            इस वाणी का पाठ किसी विषेश शुभ कार्य की सिद्धि के लिए भी किया जाता है, जो किसी भी शुभ शुभ कार्य की पूर्ति हेतु वाणी में से उस कार्यानुसार संपट लगाया जाता है। इस पाठ के करने का विधान लगातार 40 दिन का है। पाठ दोपहर 12 बजे के बाद करना होता है। देसी घी की ज्योति और धूप जगाकर पाठ करने का विधान है। इस पाठ को करने हेतु षुद्धि का पूरा ध्यान रखना होता है, तब ही कार्य की सिद्धि होती है। 
            सांय के समय का पाठ संध्या आरती है जिसकी बहुत बड़ी महिमा है। इस वाणी के पढ़ने से काल का भय भी समाप्त हो जाता है परन्तु शर्त यह है कि संध्या आरती मनोयोग से की जाए। संध्या आरती की महिमा कलम द्वारा लिखी नहीं जा सकती। आरती करने वाले ही इसकी महिमा को जानते हैं। हमारे गरीबदासी सम्प्रदाय में संध्या आरती के समय को बड़ी विषेशता दी जाती है, जबकि सारे महापुरूश और संगत मिलकर सतगुरू देव जी की वाणी संध्या-आरती उच्चारण करते हैं। श्री सतगुरू ब्रहमसागर जी भूरी वालों के उपदेश से आरती के बाद प्रार्थना और शब्द भी उच्चारण किये जाते हैं। प्रार्थना व शब्दों से प्राणी का मन और भी प्रभु के चरणों में जुड़ता है।


            संध्या आरती के बाद एक शब्द, तारेंगे तहतीक सतगुरू तारेंगे अवष्य पढ़ना होता है। इस शब्द में बताया गया है कि जो सतगुरू जी का श्रद्धावान सेवक है, उसे सतगुरू जी अवष्य तार देते हैं, पार लगा देते हैं। 


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