Thursday, October 6, 2016

स्वामी दयालु दास जी महाराज

स्वामी दयालु दास जी का जन्म कपिपाल नामक ग्राम में हुआ था | कपिपाल ग्राम भारत वर्ष के पंजाब प्रान्त में है | स्वामी दयालु दास जी के माता-पिता बड़े साधू-सेवी थे | जिसके कारण स्वामी दयालु दास जी को बचपन से ही साधु-संतो की संगति प्राप्त हुई थी | बचपन से ही स्वामी दयालु दास जी परम-पिता परमात्मा के नाम के सिमरन में मग्न रहते थे | स्वामी दयालु दास जी जी की बचपन से ही परमात्मा में अपार श्रद्धा थी |



स्वामी दयालु दास जी गरीबदासी सम्प्रदाय का अभिन्न अंग है | स्वामी दयालु दास जी ने सतगुरु गरीब दास साहिब जी की बाणी का प्रचार पुरे भारतवर्ष में जगह-जगह जाकर किया | स्वामी दयालु दास जी गरीब दास साहिब द्वारा रचित “श्री ग्रन्थ साहिब जी” को स्वम अपने सिर पर उठा कर जगह-जगह पर जाकर प्रचार किया करते थे |
स्वामी दयालु दास जी ने मात्र 12 वर्ष की आयु में अपने माता-पिता के घर का त्याग दिया था | इसके पश्चात उन्होंने पटियाला जिला के बसेरा गाँव में हंस बाबा ठाकुर दास जी से दीक्षा प्राप्त की और सन्यास ग्रहण किया कर लिया था | तात्पर्य स्वामी दयालु दास जी ने बाल्य-अवस्था में ही सन्यास ग्रहण कर लिया था | इसके पश्चात स्वामी दयालु दास जी ने 12 वर्षो तक गुप्त रहकर बड़ी तीव्र साधना की  |


                    स्वामी दयालु दास जी का स्वभाव बहुत ही सरल और प्रेमी था | जो भी एक बार स्वामी दयालु दास जी से मिल लेता वह उनका मुरीद बन जाता था | स्वामी दयालु दास जी सभी संतो व भक्तो को एक समान प्रेम की दृष्टी से देखते थे | और सभी को परम-पिता परमात्मा की भक्ति करने के लिए प्रेरित करते थे | जब स्वामी दयालु दास जी के गुरुदेव हंस बाबा ठाकुर दास जी की समाधि हो गई तब स्वामी दयालु दास जी ने बहुत बड़ा भण्डारा करवाया जिसमे हजारों की संख्या में संतो व भक्तो ने प्रसाद ग्रहण किया | इस समय तक स्वामी दयालु दास जी की ख्याति पुरे भारतवर्ष में फ़ैल चुकी थी | स्वामी दयालु दास जी जिधर भी जाते काफी संख्या में लोग उनके दर्शन करने आते थे और उनके वचनों से अपना जीवन सफल बनाते थे | स्वामी दयालु दास जी का स्वभाव बहुत ही सरल था | एक बार ठंड के समय लोगों ने स्वामी जी से पुछा कि “महाराज जी, इतनी ठंड में आपको कोई असुविधा तो नही हो रही” | तब स्वामी दयालु दास जी ने कहा कि “ठंड के कारण नींद न आने से भजन में बड़ी सुविधा रहती है” |

 संत मंदिर कोठी स्वामी दयालुदास जी, श्री छुडानी धाम 
       स्वामी दयालु दास जी की मंडली में साधू-महात्माओ की संख्या करीब ५०० रहती थी, जिसमे भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के साधू-महात्मा विध्याध्यं करते थे | सभी के प्रति स्वामी दयालु दास जी का एक समान व्यवहार रहता था |
स्वामी दयालु दास जी की परम्परा में अनेक संत महापुरुष हुए है | महामंडलेश्वर स्वामी दयालु दास जी की परम्परा में स्वामी श्यामसुंदर दास शास्त्री, स्वामी धर्मस्नेही जी परमहंस, स्वामी शान्तानन्द जी शास्त्री, साध्वी रामभज जी, स्वामी रामेश्वरानन्द जी, स्वामी सच्चदानन्द जी, स्वामी कृष्णानन्द जी, स्वामी अनन्तानन्द जी, स्वामी ऋषिश्वरानन्द जी, स्वामी धर्मदेव जी, स्वामी ज्ञानानन्द जी आदि महान संत है |
   
गरीबदासीय पंथ की संध्या आरती 
संध्या आरती में युगप्रवर्तक परमपूज्य स्वामी दयालुदास जी की साखियां:-

शरणा पुरूष कबीर का, सब संतन की ओट। गरीब दास रक्षा करें, कबहूं न लागै चोट।।
यह साखी स्वामी दयालु दास जी की है। वह कहते हैं कि कबीर साहिब का आसरा, सब सन्तन का सहारा लेने से गरीबदास जी महाराज रक्षा करेंगे, कभी भी दुःख आदि नहीं आयेगा।

कर जोरौं बिनती करौं, धरूं चरण पर षीस। सतगुरू दास गरीब हैं, पूर्ण बिसवे बीस।।
स्वामी दयालु दास जी महाराज कहते हैं मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ और चरणों पर सिर रखता हूँ। सतगुरू गरीबदास जी महाराज ही परिपूर्ण परमात्मा हैं। वही सत्यपुरूश हैं।

नाम लिये से सब बड़े, रिंचक नहीं कसूर। गरीबदास के चरणों की, सिर पर डारूं धूर।।
स्वामी दयालु दास जी कहते हैं कि महाराज गरीबदास जी का नाम लेने से सब की बढ़ौतरी हो जाती हैं, अपराध लेष मात्र भी नहीं रहते। इसलिए श्री गरीबदास जी महाराज के चरणों की धूलि को सिर पर डालकर धन्य हो रहा हूँ। बढ़ौतरी से अर्थ है सर्वांगीण विकास अर्थात् जीव का लोक परलोक संवर जाना।

बन्दी छोड़ दयालु जी, तुम लग हमरी दौर। जैसे काग जहाज को, सूझत और न ठौर।।
स्वामी दयालु दास जी महाराज कहते हैं कि बन्दी छोड़ गरीबदास जी आप दयालु हैं, हमारी दौड़ आप तक ही है, जैसे जहाज के काग कूं और कुछ नहीं सूझता। उडारी मार कर फिर जहाज पर ही लौटना पडता है।




















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