Thursday, October 6, 2016

परमहंस स्वामी रामदेवा नन्द जी महाराज


पूज्य स्वामी रामदेवा नन्द जी महाराज का जन्म् सन् 1875 में हरियाणा के भिवानी जिले के चरखी दादरी के पास ‘बड़ा पैंतावास’ गांव में एक सम्पन्न ब्राहमण परिवार में हुआ था। आप बाल्यकाल से ही भगवान की भक्ति में रूचि रखते थे। आपने केवल बीस वर्श की आयु में घर त्याग दिया तथा सन्यास लेकर विरक्त महात्माओं के साथ विचरने लगे।


स्वामी रामदेवानन्द जी
गोपालपुर (खरखौदा-सोनीपत-हरियाणा) के गरीबदासीय पंथ के महान संत पण्डित स्वामी चिदानंद जी से दीक्षा प्राप्त की। लगभग चालीस (40) साल तक आप निर्जन वनों, पर्वतों पर रहकर कठोर साधना करते रहे। एक बार आप प्रयाग (इलाहाबाद) कुम्भ पर आये हुये थे, वहां से कुछ भक्त आपको नजफगढ़ (दिल्ली)  ले आये। उसी समय से आपने सतगुरू गरीबदास जी की वाणी का पाठ करना प्रारम्भ किया। आपसे प्रभावित होकर हजारों लोग आपके सम्पर्क में आकर आपजी के षिश्य बन गये, तथा आपके ठहरने की सुविधा के लिए आश्रम बनाया। आपजी का खान-पान, रहन-सहन एवं जीवन षैली एक सधे हुये योगी की भांति थी।


आपजी ने अपने ईश्ट देव सतगुरू गरीबदास जी की स्थली ”श्री छुडानी धाम“ में बहुत सेवा करवायी। साल में दोनों मेलों पर आप पहले दिन दोपहर का भण्डारा देते थे। जो आज तक भी आपके भगतों द्वारा प्रचलित है। आप एक निश्ठावान सन्त थे। आप सतगुरू जी की वाणी तथा सतगुरू धाम में एक रस जीवन पर्यन्त विष्वास करते रहे। आपजी ने छुडानी धाम में सन्त तथा भगतों के ठहरने के लिए भवन बनवाये। भगतों के द्वारा बनवाये आश्रमों नजफगढ़ (दिल्ली), मोगा तथा तलवण्डी (पंजाब) में आज भी आपकी स्मृति में कार्यक्रम होते रहते हैं। आपका सम्पूर्ण जीवन साधनाषील रहा है।
 स्वामी रामदेवा नन्द जी का निर्वाण स्थान 

अन्तिम समय में तो आप ज्यादातर अन्तर्मुख ही रहते थे। आप सहज समाधि में रहते हुये सन् 1996 ई. में ज्योति-ज्योत समा गये। आपका प्यार, आपकी वाणी तथा आपका मार्ग-दर्षन आज भी आपके शिष्यों द्वारा हजारों, भूली-भटकी आत्माओं को सन्मार्ग पर चलाने का काम कर रहा है।


स्वामी जी की गुरू प्रणाली:-
1 आचार्य गरीबदास जी
2 स्वामी शीतलदास जी महाराज
3 स्वामी ध्यानदास जी महाराज
4 स्वामी रामदास जी महाराज
5 स्वामी ब्रहमानन्द जी महाराज (गुदड़ी वाले)
6 स्वामी जुगतानन्द जी महाराज
7 स्वामी गंगेष्वरानन्द जी महाराज
8 स्वामी पं. चिदानन्द जी महाराज
9 स्वामी रामदेवानन्द जी महाराज

 स्वामी जी के ब्रहमलीन होने के पष्चात भाई की तलवण्डी एवं मोगा के आश्रमों की देखरेख पूज्य कुबेर भण्डारी स्वामी विद्यानन्द जी महाराज कर रहे हैं।


 परमहंस स्वामी रामदेवानन्द जी के प्रमुख शिष्य महर्षि गंगादास जी वर्तमान में बडौता ग्राम, जिला सोनीपत,में वाणी प्रचार कर रहे हैं।





गरीब, कुल का खाविंद एक है, दूजा नहीं गंवार। दोय कहै सौ दोजखी, पकरा जाए दरबार।।
कुल ब्रहमाण्ड का मालिक एक परमपिता परमात्मा है। वह दो ईष्वर नहीं है। इससे अधिक परमात्मा मानते हैं या मैं और हूँ परमात्मा और है। ऐसा अज्ञानी गंवार जो समझते हैं वे बार-बार यमराज का कश्ट सहते रहेगें। आचार्य श्री नाम के सुमरण पर अधिक जोर देते हैं, नाम सुमरन का तरीका सन्त महापुरूशों, गुरूजनों द्वारा जाना जाता है। इसीलिए संतों का संग और नाम का सुमरन सार बताते हुए कहा है:- 

गरीब, नाम बिना निबहे, करनी करि हैं कोटि। सन्तन की संगत तजी, विश की बांधी पोट।।
बिना नाम सुमरन अभ्यास से तेरी चैरासी नहीं छूट सकती, चाहे तू कितने ही करोड़ों उपाय कर ले। सन्त महापुरूशों का संग त्यागकर, विशवत विशयों की पोटली साथ में लिये फिरता है। भला विश खाकर अमर कौन हुआ, अमृत नाम का पान करने से ही अमर तत्व की प्राप्ति होगी। सन्तों की सेवा का भी अधिक महत्व बताते हुए सदगुरू कबीर साहिब कहते हैं:- 

कबीर, यह तन जात है, सकै तो ठाहर लाय। कै सेवा कर साधु की, कै गोविन्द के गुणगाय।।
ए इन्सान! यह षरीर अस्थिर नाषवान है, यह जायेगा। इस अमूल्य मनुश्य षरीर को नाम सुमरन व सन्तों की सेवा कर लेखे में लगा या इस षरीर द्वारा सन्त महापुरूशों की सेवा कर अन्तःकरण षुद्ध कर, ज्ञान द्वारा मोक्ष पद प्राप्त कर ले। अगर सेवा नहीं कर सकता, तो हरि सुमरन कर अपने वास्तविक यथार्थ स्वरूप को जानकर कल्याण कर। 

वृक्षा स्वफल न भखत हैं, नदी न अंचवै नीर। परस्वारथ के कारने, सन्तन धरया शरीर।।
वृक्ष अपने फल को आप भक्षण नहीं किया करते और नदी अपने पानी को आप नहीं पीती उसी प्रकार सन्त महापुरूश ज्ञान द्वारा केवल अपना ही कल्याण नहीं करते हैं, वे तो इस असार संसार में दीन दुखियों, भूले भटके जीवों को सदमार्ग पर चलाकर अपने सद उपदेष द्वारा भवसागर से पार करते हैं। सन्तों की महिमा षास्त्रों में अनेक प्रकार से लिखी गई है। आचार्य गरीबदास जी भी महापुरूशों, सन्तों की अधिक महिमा गाते हुए कहते हैं:- 

गरीब, सन्त मुक्ति के पौलिया, कीजे इनसे प्यार। कुंजी इनके हाथ में, खोलै मुक्ति द्वार।।
सन्त मुक्ति दरवाजे के दरबान है, जिस प्रकार किसी के डयोढ़ी पर बिना दरबान (चैकीदार) की आज्ञा के कोई मालिक को नहीं मिल सकता। उसी प्रकार उस मालिक परम पिता परमात्मा के दरबार के सन्त दरबान हैं। इसलिए सन्तों से सम्पर्क करना चाहिए, क्योंकि उस परम पिता परमात्मा से मिलने की युक्ति रूपी चाबी इन्हीं के हाथ है। युक्ति के बिना मुक्ति नहीं होती है। उस युक्ति के द्वार (बजर किवाड़) को खोलने में सन्त ही समर्थ हैं। 
सत साहिब


2 comments:

  1. रामदेवानन्द जी kye parkar ki sidhio ke malik the.unki heighy 6f 2' ke laghbhag thi or yogio jaisa takda sharir tha.vo sadha nirlape rahe....antim samay bhut kam khaate the.

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  2. रामदेवानन्द जी kye parkar ki sidhio ke malik the.unki heighy 6f 2' ke laghbhag thi or yogio jaisa takda sharir tha.vo sadha nirlape rahe....antim samay bhut kam khaate the.

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