Saturday, June 13, 2026

धन-धन स्वामी चेतन दास जी महाराज

 सत्यपुरुष सद्गुरु कबीर साहेब जी के ही साक्षात् स्वरूप आचार्य श्री गरीब दास साहिब जी की नादी परम्परा में धन धन स्वामी चेतन दास जी महाराज एक ऐसे देदीप्यमान नक्षत्र थे, जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन गरीबदासीय वाणी के प्रचार-प्रसार, संपादन और साधना में समर्पित कर दिया।

 प्राकट्य, जन्म एवं बाल्यकाल

स्वामी चेतन दास जी महाराज का प्राकट्य वैशाख शुक्ल दशमी, ई. सन् 1870 (तदनुसार वर्ष 1927 विक्रमी, मंगलवार, पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र) को श्री चोहला साहिब, अमृतसर (पंजाब) में एक प्रतिष्ठित वैश्य परिवार में हुआ था आपके पिता का नाम लाला काकू राम जी तथा माता का नाम श्रीमती राधा जी था।

विवाह के 10 वर्ष तक लाला काकू राम जी के घर कोई संतान नहीं थी। उनके घर से एक किलोमीटर दूर जंगल में एक कुआं था, जहाँ पीपल के वृक्ष के नीचे एक उच्च कोटि के अवधूत महापुरुष स्वामी लाल दास जी महाराज रहा करते थे (जो निरंतर धुना चेतन रखते थे)। उन्हीं महापुरुष के शुभ आशीर्वाद से स्वामी चेतन दास जी का जन्म हुआ।


प्रारंभिक शिक्षा और दीक्षा

माता-पिता ने अपने वचन के अनुसार, मात्र  5 वर्ष की आयु में अपने इस ज्येष्ठ पुत्र को स्वामी लाल दास जी महाराज के चरणों में सौंप दिया। स्वामी लाल दास जी के सानिध्य में रहकर 7 वर्षों तक आपने हिंदी और पंजाबी भाषा का गहन ज्ञान प्राप्त किया। जब आपकी आयु 12 वर्ष हुई, तब स्वामी लाल दास जी ने आपको विश्वविख्यात महापुरुष स्वामी दयालु दास जी महाराज की विशाल मंडली (जिसमें सदैव 600 संत रहते थे) में शामिल कर दिया। 

मंडली में रहते हुए स्वामी जी के भीतर शास्त्रीय ज्ञान की तीव्र उत्कंठा जाग्रत हुई। आपने मंडली के दक्षिण अफ्रीका प्रवास (2 वर्ष) के दौरान वेदांत के कठिन ग्रंथों जैसे पंचदशी और विचार सागर का गहन अध्ययन किया।

 ई. सन् 1888  स्वामी दयालु दास जी के साथ सर्वप्रथम आप जी ने परम् धाम श्री छुड़ानी धाम के दर्शन किए। 

अमृतसर के ब्रह्म बूटा अखाड़ा में रहकर आपने ई. सन् 1892 से 1895 तक संगल वाले अखाड़े के संस्कृत विद्यालय से लघु सिद्धांत कौमुदी का गहन अध्ययन किया।

 अखाड़े का प्रबंधन: आपकी योग्यता को देखते हुए अवधूत स्वामी केशवानंद जी ने आपको ब्रह्मबूटा अखाड़े का प्रबंधक (मैनेजर) बना दिया। जीवनपर्यंत वहाँ एक चौबारा (कमरा) आपके नाम रहा, जहाँ से आपके ब्रह्मलीन होने के बाद दुर्लभ पुस्तकों की एक पूरी बोरी प्राप्त हुई थी।

 वाणी का आद्योपान्त अध्ययन: इसके पश्चात आपने अहिर माजरा के बाड़े में स्वामी रामकृष्ण दास जी के सानिध्य में 3 वर्ष बिताए और आचार्य श्री गरीबदास जी महाराज की अमृतमयी वाणी (श्री ग्रंथ साहिब) का आदि से अंत तक (आद्योपान्त) गहरा अध्ययन किया।

 प्रिंटिंग प्रेस न होने के काल में भी आपने हस्तलिखित प्रतियों के माध्यम से देश-विदेश में सतगुरु की वाणी की अलख जगाई। आपने भारत के अतिरिक्त:दक्षिण अफ्रीका, ईरान, इटली, अफगानिस्तान, मलाया (मलेशिया), रंगून (म्यांमार), सिंगापुर, अंडमान-निकोबार और श्रीलंका तक यात्राएं कर गरीबदासीय मत का परचम लहराया।

सुनने में आता है कि अपने समय के महान तपस्वी स्वामी भूरीवाले ब्रह्म सागर जी महाराज, स्वामी चेतन दास जी का सगे भाई जैसा सत्कार करते थे। वे स्वामी जी को शिरोमणि जी महाराज या बड़े महापुरुष  कहकर संबोधित करते थे और मानते थे कि साधु समाज में इनसे बड़ा ज्ञानी कोई नहीं है।

 परम सादगी और निष्कपट जीवन


स्वामी जी जीवनपर्यंत कैरों (पंजाब) में अपने हाथ से बनाए कच्चे मिट्टी के मकान में रहे। भक्तों द्वारा पक्का कमरा बनाने के आग्रह पर वे कहते थे— अपनी मौज-मस्ती में पैसा नहीं लगाना चाहिए, बल्कि साधु-संतों के भंडारे में खर्च करना चाहिए। वे अपना भोजन स्वयं बनाते थे और एकांत में मस्त रहते थे। 

सन् 1943 में स्वामी रामकृष्ण दास जी के शरीर छोड़ने से पूर्व, उन्होंने एक बालक (जो बाद में स्वामी धर्म स्नेही जी बने) और अपना बाड़ा स्वामी चेतन दास जी को सौंपा। स्वामी जी ने उस बालक को पढ़ाया-लिखाया, काशी में विद्वान संतों को सौंपकर योग्य बनाया और पूर्ण ईमानदारी से उन्हें उनके मूल गुरु (स्वामी रामकृष्ण दास जी) का ही नाम दिया।

1962-1965 में हरिद्वार में रहकर स्वामी जी ने 3 वर्षों के कठिन परिश्रम से आचार्य श्री की अमृतमयी वाणी का गहन संशोधन व संपादन किया।  जिसका सम्पादन पूज्य स्वामी धर्म स्नेही जी ने दो भागों में करवाया।

महाप्रयाण

22 मई, ई. सन् 1975 (वैशाख शुक्ल द्वादशी) के तीसरे पहर के प्रथम चरण में इस महान विभूति ने चोहला साहिब (पंजाब) में अपनी पांचभौतिक देह रूपी चादर का परित्याग कर सतलोक प्रस्थान किया।

स्वामी चेतन दास जी महाराज की पावन स्मृति में आज भी श्री चोहला साहिब और कैरों (पंजाब) दोनों स्थानों पर उनकी पवित्र समाधियाँ स्थापित हैं। इन दोनों ही स्थानों पर प्रतिवर्ष विशाल वार्षिक संत समागम (उत्सव) आयोजित किए जाते हैं, जहाँ हजारों श्रद्धालु इस महान वाणी मर्मज्ञ और त्यागी पुरुष के चरणों में अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। 

महाराज जी स्वामी चेतन दास जी का मेरे पिता जी पाठी पंडित प्रेम सिंह जी से बहुत प्यार व लगाव था वह हमेशा कहते थे "ओ पंडिता कुछ सुना सद्गुरु जी की वाणी का भजन सुना, तो पिता जी कहते स्वामी जी आपके सामने कैसे कुछ सुना सकते है आप तो सब जानते हो, आप वाणी के मर्मज्ञ ज्ञानी हो। फिर भी स्वामी जी भजन जरूर सुनते थे।"

कई जगह से जानकारी संग्रह करके स्वामी जी के बारे में यह लेख प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया है। कृपा कोई त्रुटि हो उसे ठीक करवाने में सहायता करे। और सभी भक्तों से अनुरोध है कि यदि आपके पास हमारी गरीबदासीय सम्प्रदाय कर संत महापुरुषों जीवनी है तो कृपा हमें भेजे।

ऐसे परम संत गरीबदासीय वाणी के मर्मज्ञ ज्ञानी को पाठी पंडित प्रेम सिंह गरीबदासीय ई-ग्रंथालय की टीम की ओर से कोटि-कोटि नमन .......


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