एक बार सद्गुरु बंदीछोड़ गरीब दास जी महाराज अपने शिष्यों सहित भरतपुर से वापस लौट रहे थे। मार्ग में चलते हुए उन्हें एक कुआं दिखाई दिया। सद्गुरु जी ने शिष्यों से कहा, "हम यहाँ कुछ देर विश्राम करेंगे, स्नान और जलपान करके फिर आगे की यात्रा पर चलेंगे।"
सद्गुरु जी की आज्ञा पाकर सभी शिष्य जल लेने और आस-पास घूमने निकल गए। वहीं कुछ दूरी पर एक किसान अपने खेत में हल चला रहा था। वह अपने एक नए बैल को बार-बार डंडे से बुरी तरह पीट रहा था, इसके बावजूद वह बैल ठीक से नहीं चल रहा था। दयालु सद्गुरु जी टहलते हुए उस किसान के नजदीक पहुँच गए।
इसी बीच किसान की पत्नी उसके लिए दोपहर का भोजन लेकर खेत में आ गई। किसान बैलों को वहीं रोककर, हाथ-मुँह धोकर भोजन करने बैठ गया।
सत्गुरू जी का दिव्य संदेश
इधर सद्गुरु जी अपनी दिव्य दृष्टि से सारा कौतुक देख रहे थे। वे उस नए बैल के पास गए और उसके कान में धीरे से कहा: "हंस! बदला तो तुम्हें चुकाना ही पड़ेगा, चाहे रोकर चुकाओ या हँसकर चुकाओ।"
यह कहकर सतगुरु जी वापस कुएं की ओर चले गए। उधर भोजन कर रहा किसान दूर से यह सब देख रहा था। भोजन समाप्त करने के बाद जब वह वापस बैलों के पास आया और हल चलाना शुरू किया, तो वह हैरान रह गया। जो नया बैल अब तक कदम नहीं बढ़ा रहा था, वह अब पुराने अनुभवी बैल से भी तेज आगे-आगे चलने लगा।
किसान की जिज्ञासा
किसान आश्चर्यचकित होकर हल रोककर तुरंत कुएं की तरफ भागा, जहाँ सत्गुरू जी स्नान और ध्यान कर रहे थे। किसान शिष्यों के पास जाकर खड़ा हो गया और आदरपूर्वक पूछा, "महानुभाव! आप सब कौन हैं और कहाँ से पधारे हैं?"
एक शिष्य ने उत्तर दिया, "हम सब छुड़ानी धाम से आए हैं और हमारे साथ हमारे पूज्य सत्गुरू देव बंदीछोड़ गरीबदास जी महाराज हैं।"
किसान ने सद्गुरु जी महिमा और उनकी लीलाओ बारे में पहले भी सुन रखा था। वह हक्का-बक्का रह गया कि इतने महान सन्त स्वयं चलकर उसके जैसे गरीब किसान के खेत पर आए हैं। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। उसने सोचा, "मुझ जैसे दीन-हीन के भाग्य कैसे जाग गए! यह तो प्रभु की अपार और अकारण कृपा है।"
वह भाव-विभोर होकर सत्गुरू जी के चरणों में साष्टांग दंडवत प्रणाम करने लगा। दयालु दाता ने उसे उठाकर धीरज बंधाया और अपने पास बिठा लिया
पूर्वजन्म का रहस्य
किसान ने हाथ जोड़कर पूछा, "हे भगवन! आपने इस बैल के कान में ऐसा क्या कह दिया कि इसका व्यवहार पूरी तरह बदल गया? मैं इसे पीट-पीट कर थक गया था, पर यह टस से मस नहीं होता था। अब यह सबसे आगे चल रहा है!"
किसान का भोलापन देखकर सद्गुरु जी मुस्कुराए और उसके सिर पर अपना कृपालु हाथ फेरते हुए बोले, "हे भक्त! तुम इस बैल के रहस्य को नहीं जानते। यह पूर्वजन्म में वही महात्मा रामदास है, जो तुम्हारे घर के चौबारे (ऊपरी कमरे) में रहा करता था। उसने साधु का भगवा बाणा (वस्त्र) तो धारण कर लिया था, लेकिन उसे सन्त की मर्यादा, साधना और भजन का वास्तविक ज्ञान नहीं था। संसार और परिवार के दुखों से भागकर वह केवल मुफ़्त का खाने तुम्हारे घर आया था। उसने पूरा जीवन आलस्य में बिताया, कभी निष्काम सेवा या सुमिरण नहीं किया। तुम्हारे घर का जो अन्न उसने बिना पुरुषार्थ के खाया था, आज उसी का ऋण चुकाने के लिए यह तुम्हारे घर बैल बनकर आया है। मैंने इसके कान में बस यही चेताया है कि ऋण तो चुकाना ही पड़ेगा, चाहे रोकर चुकाओ या हँसकर। तब इसे अपनी भूल का अहसास हुआ।"
कर्मों से मुक्ति का मार्ग
सद्गुरु जी की बात सुनकर किसान डर गया और घबराकर कहने लगा, "हे महाराज! मुझसे तो बहुत बड़ा पाप हो गया। मैं इतने दिनों से इसे महात्मा जानकर नहीं, बल्कि पशु समझकर मारता-पीटता रहा। मैंने इस पर बहुत अत्याचार किया है। मैं इस पाप से कैसे मुक्त होऊँगा?"
किसान को आत्मग्लानि में डूबा देख दयालु सत्गुरू जी ने अत्यंत प्रेमपूर्वक समझाया, "घबराओ मत, कर्म का सिद्धांत अटल है, इसे अपना भोग तो भोगना ही पड़ेगा। यदि तुम इस जन्म में इसके साथ बेरहमी करोगे और इससे बैर रखोगे, तो अगले जन्म में तुम्हें इसका हिसाब देना होगा और यह फिर तुम्हारे पास आएगा। इसलिए अब ऐसा मार्ग चुनो जिससे तुम्हारा और इसका, दोनों का कल्याण हो जाए। आज के बाद इस पर लाठी मत उठाना, इसे प्यार से रखना, समय पर चारा-पानी देना और आदर से बोलना। बस, इसी दया भाव से तुम दोनों का उद्धार हो जाएगा।"
सद्गुरु जी से ज्ञान और शांति पाकर किसान कृतार्थ हो गया। इसके बाद सत्गुरू जी अपने शिष्यों सहित वहाँ से आगे प्रस्थान कर गए। रास्ते में अन्य भक्तों को निहाल करते और उपदेश देते हुए, कुछ दिनों बाद वे सकुशल अपने छुड़ानी धाम वापस लौट आए।
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अपनी दिव्य वाणी में सद्गुरु गरीबदास साहिब जी महाराज कर्मों के अटल नियम का उपदेश देते हैं। वे बताते हैं कि संसार में किया गया प्रत्येक कर्म, चाहे वह कितना ही छोटा क्यों न हो, उसका पूरा लेखा-जोखा रखा जाता है। मनुष्य जो भी खाता, बोलता, सोचता और करता है, उसका हिसाब अवश्य देना पड़ता है।
-: सद्गुरु गरीबदास साहिब जी की दिव्य वाणी :-
एक एक दाणें का लेखा है। जेते दाणे तूं चाबैगा, जेती बेर तेरी गुद्दी की राह जुबान काढ़ियेगी।
मौहम्मद और माधो कूँ पूछि देखो। एक एक दाणा चाब्या था, सो अजहूँ नहीं छूटे।
फरीद बारह वर्ष कूये में लटके। माथे पर काग आनि बैठे, आँखि काढ़ने कूँ।
एक मन मुरारि तपस्वी कूँ तप किया था। दस हजार वर्ष शिला पर। फिर औह दरगाह में गया।
वहां धर्मराय बोल्या, अदलि करूं अक फलज करूं? बोल्या, अदलि करो। शिला हमारी क तुम्हारी ? ना तुम्हारी।
तो दस हजार वर्ष शिला धरि ले सिर ऊपर। फिर मन मुरारि ने कह्या, फजल करो।
धर्मराय बोल्या, लेखे सिर लेखा है भाई। मैं धर्म का राज करू हुँ।
तेरे सिर तै उतारौं, तो मेरे सिर धरिये। अदलि कर के फजल करूंगा।
जब मन मुरारि तपस्वी ने कह्या, हजार बार तोबा है। तपस्वी तो अनंत कोटि हो हो गये।

Very nice story.
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