Wednesday, May 24, 2017

अथ ब्रह्म वेदी (सरलार्थ)

ज्ञान सागर अति उजागर, निर्विकार निरंजनं।
ब्रह्म ज्ञानी महा ध्यानी, सत्य सुकृत दुख भंजनं।।1।।
सतगुरू गरीबदास महाराज जी का कथन है कि पारब्रह्म प्रभु ब्रह्मदेव ज्ञान का सागर हैं और तेजपुंज प्रकाश स्वरूप है। उनमें कोई भी विकार नहीं है और वह मायामय आंखों के देखने में नहीं आते। उस बह्म देव को जानने वाले अर्थात् उसका सदैव ध्यान करने वाले को ही ज्ञानी और ध्यानी कहा जाता है। उस सत्यपुरूष का ज्ञान और ध्यान करने से समस्त  दुःख दूर हो जाते हैं। अब सतगुरू जी इस काया के भीतर सूक्ष्म काया के समस्त कंवलों का वर्णन करते हैं।

"मंगलाचरण" सरलार्थ                                                                    "अथ गुरु देव का अंग" सरलार्थ 

मूल चक्र गणेश वासा, रक्त वर्ण जहां जानिये।
किलियं जाप कुलीन तज सब, शब्द हमारा मानिये।।2।।
मूल चक्र, जिसे मूलाधार कहते हें, यह गुदा स्थान में है। यहां गणेश जी का
निवास है। इस कंवल का रंग लाल है। यह चार पंखुड़ी का कमल है।
इस कमल में प्राण स्थिर करके साधक जन किलियं शब्द का जाप करते हैं।
सतगुरू जी कहते हैं कि हमारा वचन मान कर बुरे विचारों का त्याग करना चाहिए।

स्वाद चक्र ब्रह्मादि वासा, जहां सावित्री ब्रह्मा रहै।
ओउम् जाप जपंत हंसा, ज्ञान योग सतगुरू कहै।।3।।
मूलाधार के उपर जननेन्द्री में स्वाद चल अर्थात् स्वादिष्ठान चल
है वहां सृष्टि को पैदा करने वाले ब्रह्मा जी सावित्री सहित निवास करते हैं। इसका श्वेत
 रंग है और आठ पंखुड़ियों का कमल है। जहां योगी जन प्राणों को स्थिर करके 
ओउ्म बीज मंत्र का जाप करते हैं। इस उपासना को सतगुरू जी ज्ञान योग कहते हैं।

नाभ कंवल में विष्णु विश्वम्भर, जहां लक्ष्मी संग बास है।
हरियं जाप जपंत हंसा, जानत बिरला दास है।।4।।
स्वाद चल से उपर नाभि स्थान में नाभि-कमल है। जहां जगत् का पालन
करने वाले विष्णु भगवान जी, लक्ष्मी जी के साथ निवास करते हैं। इस कंवल का
रंग सांवला है। योगी इस कमल में प्राणस्थिर करके हरीयं का जाप करते हैं।
सतगुरू देव जी का कोई विरला साधक ही इस भेद को जानता है।

हिरदे कंवल महादेव देवं, सती पार्वती संग है।
सोहं जाप जपंत हंसा, ज्ञान योग भल रंग है।।5।।
नाभिकमल से उपर हहृय  कमल है। इस कमल में भगवान महादेव शंकर
जी सती पार्वती के साथ निवास करते हैं। इस कमल का रंग स्वर्णिम है। यह बारह
पंखुड़ियों का कमल है। इस कमल में साधकजन प्राणस्थिर करके सोहं बीज मंत्र का
 जाप करते है। इस जाप के साथ बहुत शीघ्र ब्रह्म ज्ञान का रंग चढ़ता है।

कंठ कंवल में बसै अविद्या, ज्ञान ध्यान बुद्धि नास ही।
लील चल मध्य काल कर्मं, आवत दम कूंफास ही।।6।।
हहृय  कमल से उपर कण्ठ कमल है। जहां अविद्या का निवास है। इस
अविद्या के कारण प्राणी की बुवि भ्रमित होती है। जिसके कारण प्रभु
का ज्ञान ध्यान प्राणी को भूल जाता है। कण्ठ कमल का नीला रंग है और यह
सोलह पंखुड़ियों का कमल है। इस कमल में जन्म-मरण का कारण बनने वाले
कर्म हैं। मौत के समय दम को रोक कर आत्मा के प्राण इस कमल में से
यमदूत निकालकर ले जाते हैं। प्रभु के ज्ञान और ध्यान के बल से इस कमल में से
 अविद्या और कालकर्मों को नष्ट किया जाता है। काल की पहुंच इस कंवल तक
ही है। इससे उपर नहीं है।

त्रिकुटी कंवल परमहंस पूर्ण, सतगुरू समरथ आप हैं।
मन पवना सम सिंध मेलो, सुरति निरत का जाप हैं।।7।।
नाक से उपर दोनों आंखों के मध्य त्रिकुटी कमल है। यहां इल़ा, पिंगला
और सुष्मना तीनों नाड़ियां इक्ट्ठी होती हैं। इसी कारण इसे त्रिवेणी संगम भी कहा जाता है। 
यहां परम हंस पूर्ण ब्रह्म सतगुरू देव स्वयं बिराजमान हैं। यह दो पंखुड़ियों का कंवल है। 
सुर्ति शब्द योग के जानकार गुरूद्वारा बताई गई युक्ति से मन, पवन को सुर्ति निरत
 से जोड़कर गुरू शब्द का जाप करते हुए इस कमल में स्थिरता की जाती है।

सहंस कंवल दल आप साहिब, ज्यौं फूलन मध्य गंध है।
पूर रहा जगदीश योगी, सत्य समरथ निरबंध है।।8।।
त्रिकुटी कमल के उपर सिर के उपरी भाग में दशम द्वार है जिसे सतगुरू जी
सहस कंवल कहते हैं। यह हज़ार पंखुड़ियों का कमल है। इस कमल में
पारब्रह्म प्रभु समर्थ साहिब इस तरह विराजमान हैं जिस तरह फूलों के मध्य सुगंधि 
विराजमान रहती है। समस्त जगत के स्वामी सत्यपुरूष समर्थ प्रभु 
जो किसी बंधन में नहीं है इस कंवल में पूर्ण रूपेण विराजमान है।

मीनी खोज हनोज हरदम, उलट पंथ की बाट है।
इला पिंगुला सुष्मण खोजो, चल हंसा औघट घाट है।।9।।
इस काया में सूक्ष्म प्रभु को खोजना उल्टे मार्ग चलना है अर्थात्
जिस तरह मछली तेज़ चलते हुए पानी में उल्टी दिशा को चलती है। इसी तरह
सतगुरू जी कहते हैं कि अपने श्वासों को उल्टा कर सहस्त्र दल कमल में स्थिर
करें। इड़ा पिंगला और सुष्मना के मार्ग चलते हुए इस दुर्गम घाटी को पार करके
 दशम द्वार में प्रभु के दर्शन करो।

ऐसा योग वियोग वरणौं, जो शंकर नैं चि धर्या।
कुंभक रेचक द्वादश पलटे, काल कर्म तिस तैं डर्या।।10।।
सतगुरू गरीब दास जी ऐसे योग का वर्णन करते हैं जिसे प्रभु के बिरह-वियोग में शंकर 
महादेव जी ने अपने चि में धारण किया था। यह प्राण-अपान द्वारा उपासना है। मनुष्य
 का श्वास हहृय  में से उठकर नाक से बाराह अंगुल बाहर तक जाता है और फिर उल्ट
 कर हहृय  में आ जाता है। बाहर जाता हुआ श्वास गर्म तत्व जिसको प्राण कहा 
जाता है और वापस अन्दर आता हुआ श्वास शीत तत्व जिसे अपान कहते हैं। हहृय 
के अंदर और बाहर यह प्राण-अपान, पूरक और रेचक (खाली करना) करते हुए हमेशा
 अपनी चाल से चलते रहते हैं। जब तक मनुष्य जीवित रहता है, यह लिया लगातार
 चलती रहती है। जिस समय यह श्वास अपने तत्व को पलटते हैं, उससमय जो एक-दो 
पल होते हैं उन्हें कुम्भक कहा जाता है। इस कुंभक के पल में जो ध्यान लगाता है 
वही आत्म-तत्व का अनुभव करता है। इस युक्ति के जानकार
 साधक से काल और कर्म डरते हैं।

शुन्य सिंहासन अमर आसन, अलख पुरूष निरबान है।
अति ल्यौलीन बेदीन मालिक, कादिर कूं कुरबान है।।11।।
जिस प्रभु को इन आंखों से नहीं देखा जा सकता, ऐसा अलख पुरूष
स्वरूप जो ब्रह्म है उसका सिंहासन सुन्न मण्डल अर्थात् दशम द्वार में है। वह सदा
अमर है और उसकी कोई जाति, वर्ण, दीन और मज़हब नहीं है। सब जगह भरपूर
होकर विराजमान है। सतगुरू जी कहते हैं कि ऐसे कर्ता पुरूष
सबके मालिक से मैं कुर्बान जाता हूं।

है निरसिंध अबंध अविगत, कोटि वैकुण्ठ नख रूप है।
अपरम पार दीदार दर्शन, ऐसा अजब अनूप है।।12।।
पारब्रह्म प्रभु बन्धन मुक्त, सन्धि रहित अर्थात् उसे किसी के साथ जोड़ा नहीं
जा सकता। उसकी गति कोई नहीं पा सकता। करोड़ों ही बैकुण्ठ लोक ऐसे प्रभु के
 नाखुनों के रूप में है। ऐसे प्रभु का दर्शन दीदार ऐसा अजब है कि उसकी किसी
 वाणी से उपमा नहीं की जा सकती। वह अद्वितीय है।

घुरै निशान अखंड धुनि सुनि, सोहं वेदी गाईये।
बाजे नाद अगाध अग हैं, जहां ले मन ठहराईये।।13।।
साहिब प्रभु के दरबार में उसकी महिमा के झण्डे झूल रहे हैं और नगाड़े जैसी लगातार
 गूंज हो रही है। सोहं की धुन से उसका उपमा-गान हो रहा है। नाद बज रहे हैं। ऐसे
 अगम-अगाध प्रभु के दरबार में अपने मन को ठहरा कर उसके
 चरण-कमलों का ध्यान धरो।

सुरति निरति मन पवन पलटै, बंकनाल सम कीजिये।
श्रवै फूल असूल अस्थिर, अमीं महारस पीजिये।।14।।
सतगुरू जी कहते हैं कि हे प्राणी! तू अपने मन और श्वास को सुर्त-निरत से
जोड़ कर त्रिकुटी कमल में स्थिर कर और बंकनाल अर्थात् मेंरूदण्ड को सीधा रख कर
 साहिब के नाम का अभ्यास कर। जब तूं ऐसी धारणा वाला अभ्यास करेगा तो
वहां से जो अमृत टपकता है उस अमृत को पी कर अमर हो जाएगा।

सप्तपुरी मेरडंड खोजो, मन मनसा गहि राखिये।
उड़ि है भंवर अकाश गवनं, पांच पचीसौं नाखिये।।15।।
सात कंवलों और मेरूदण्ड (सुष्मना नाड़ी) की खोज करो। अपने मन के
ख्यालों पर काबू पाकर इन्हें स्थिर करो। पांच तत्व और पच्चीस प्रकृतियां जो मन 
की सेना है इसे वश में करो। ऐसा करने से जीवात्मा गगन मण्डल में पहुंच जाती है।

गगनि मंडल की सैल कर ले, बहुरि न ऐसा दाव है।
चल हंसा परलोक पठाउं, भवसागर नहीं आव है।।16।।
उक्त लिखित धारणा में रह कर गगन मण्डल में प्रवेश करो अर्थात्, वहां के
दर्शन करो। मानव जीवन अमूल्य है। इसी जीवन में यह काम हो सकता है। ऐसा
अवसर फिर नहीं मिलता। इसलिए हे जीव! तू हमारे बताए हुए मार्ग पर चल।
 हम तुम्हें ऐसे उत्तम लोक में भेजते हैं जहां से तू जन्म-मरण के
 चक्कर से छुटकारा पाकर फिर भवसागर में नहीं आएगा।

कंद्रप जीत उदीत योगी, षट करमी यौह खेल है।
अनभय मालनि हार गूंदै, सुरति निरति का मेल है।।17।।
जो साधक कामदेव को जीत लेता है वही प्रसिव योगी है। ये
षट्कर्मी (धोती, नेति, वस्ती, नौली, गजकर्मी, त्राटक) योग लिया है। इस योग
लिया से शरीर और मन निर्मल हो जाता है। ऐसी करनी वाले साधक का सुर्ति-निरति के 
द्वारा जब ध्यान स्थिर हो जाता है अर्थात् समाधि लग जाती है तो अभय मालिन
 ऐसी निर्मल आत्मा के गले में डालने हेतु हार गूंथती है अर्थात् उसे अभय (जहां किसी
 का कोई डर नहीं) पद प्राप्त हो जाता है।

सोहं जाप अथाप थरपै, त्रिकुटी संजम धुनि लगै।
मानसरोवर न्हान हंसा, गंग सहंस मुख जित बगै।।18।।
सोहं मंत्र का जाप जब श्वास से किया जाता है, उसे अजपा जाप कहा जाता
है। साधक हहृय  में अजपा जाप धारण करे और संयम पूर्वक त्रिकुटी कंवल में
ध्यान लगाए। ऐसा ध्यान करने से उस स्थान पर मान सरोवर रूपी गंगा में स्नान हो
जाता है जो हज़ारों धाराओं में यहां बह रही है।

कालंद्री कुरबान कादर, अविगत मूरति खूब है।
छत्र श्वेत विशाल लोयन, गलताना महबूब है।।19।।
कलंदरी, जो ज्ञान भक्ति रूपी गंगा त्रिकुटी कंवल में है, उस कादिर
 का ही रूप है। उसकी गति कोई नहीं पा सकता। वह अति सुन्दर मूरत
है। हम उस पर से बलिहार जाते हैं। उस सुन्दर मूरत प्रभु के शीश पर सफेद 
छत्र है और उसके बहुत सुन्दर नेत्र हैं। वह सबका प्रीतम अपनी मस्ती में
 उस स्थान पर विराजमान है।

दिल अंदर दीदार दर्शन, बाहिर अंत न जाईये।
काया माया कहां बपरी, तन मन शीश चढ़ाईये।।20।।
सतगुरू जी कहते हैं कि ऐसे प्रीतम प्रभु का दीदार-दर्शन अपने दिल के
अन्दर ही होता है। उसे कहीं बाहर ढूंढने की ज़रूरत नहीं है। ऐसे प्रीतम प्रभु के दर्शन करने 
के लिए यह शरीर और संसार की माया मामूली चीज़ है। उसे अपना शीश देकर भी 
दीदार हो जाए तो सस्ता ही है। ऐसे प्रभु को पाने हेतु अपना तन-मन-धन उसे
 अर्पण कर दें।

अविगत आदि जुगादि योगी, सत्य पुरूष ल्यौलीन है।
गगनि मंडल गलतान गैबी, जाति अजाति बेदीन है।।21।।
ऐसा प्रभु जिसकी महिमा का कोई पार नहीं पा सकता, वह सबका आदि
कारण है अर्थात् सारा संसार उस से ही उत्पन्न हुआ है। वह सतगुरू
समस्त प्राणियों में समाया हुआ है। वहीं प्रभु गगन मण्डल में विराजमान है जिसकी 
कोई जाति और दीन नहीं है। वह प्रत्येक प्राणी में
समान रूप में समाया हुआ है।

सुखसागर रतनागर निर्भय, बिन मुख बानी गावही।
बिन अकार अजोख निर्मल, दृष्टि मुष्टि नहीं आवही।।22।।
साहिब प्रभु सुख का सागर है और रत्नों की खान है। उसे किसी का भय
नहीं है। बिना मुख के ही वह वाणी बोलता है। उसका न ही कोई आकार है न ही
तोल-माप है। वह अति निर्मल है। वह इन आंखों से दिखाई नहीं देता और
 किसी की पकड़ में नहीं आता।

झिलमिल नूर जहूर जोती, कोटि पदम उजियार है।
उलटै नैंन बेसुंनि विस्तर, जहां तहां दीदार है।।23।।
साहिब प्रभु का नूर अति प्रकाशमान झिलमिल-झिलमिल कर रहा है।
उसके नूर का करोड़ों पदमों जितना उजाला है। उसके दर्शन
करने हेतु दोनों आंखों की पुतलियों को पलट कर जब त्रिकुटी कंवल
में देखने का अभ्यास किया जाता है तो उसके नूर का समस्त 
जगत में दर्शन होने लगता है।

अष्ट कंवल दल सकल रमता, त्रिकुटी कंवल मध्य निरख हीं।
श्वेत धुजा शुन्य गुमट आगे, पंच रंग झंडे फरक हीं ।।24।।
साहिब प्रभु शरीर के समस्त कंवलों में समाया हुआ है। परन्तु सुरति
निरत के द्वारा उसे त्रिकुटी कमल में देखा जाता है। इस सुन्न स्थान में सफेद गुम्बज
 के आगे पांच रंगों के झण्डे लहरा रहे हैं। इस स्थान पर ऐसे
 सुन्दर गुम्बज में प्रभु के दर्शन होते हैं।

शुन्य मंडल सत्य लोक चलिये, नौदर मूंद बेसुंनि है।
बिन चिश्म्यौं एक बिंब देख्या, बिन श्रवन सुनि धुंन है ।।25।।
इस काया के नौ द्वार ;गुदा द्वार, मूत्र द्वार, मुख द्वार, दो आंखें, दो कान छिद्र,
दो नासिका छिद्रद्ध बन्द करके अर्थात् उन पर से ध्यान को हटाकर सुन्न मण्डल
दशम द्वार अर्थात् सत्य लोक को जाते हैं। जब प्राणी ऐसा ध्यान लगाता है तो
सुन्न मण्डल में बिन आंखों के निरत के द्वारा एक सुन्दर स्वरूप का दर्शन होता है।
 बिना कानों के सुरति से अति प्यारी धुनि सुनाई देती है।

चरण कंवल में हंस रहते, बौहरंगी बरियाम है।
सूक्ष्म मूरति श्याम सूरति, अचल अभंगी राम है ।।26।।
साहिब प्रभु के चरण कमलों का ध्यान करने वाले हंस उनके
चरण कमलों में मस्त रहते हैं। वह प्रभु बहुरंगी वरियाम है उसका
सूक्ष्म स्वरूप और सांवली सूरत है। वह सदैव अचल और अविनाशी राम है।

नौ स्वर बंधि निशंक खेलो, दसमें दर मुख मूल है।
माली न कूप अनूप सजनी, बिन बेली का फूल है ।।27।।
सतगुरू देव जी का उपदेश है कि हे जीव! अपनी काया के नौ द्वार बंद
करके शंका रहित हो कर दशम द्वार में प्रभु का ध्यान लगाओ। यह दशम द्वार ही
प्रभु का मूल स्थान है। यह स्थान अति सुन्दर है। बिना माली के, बिना कुएं के इस स्थान 
पर उपमा रहित सुन्दर बागीचे की अतिशोभा है। उस बागीचे में बिना लताओं 
और पौधों के सुन्दर फूल शोभा दे रहे हैं।

स्वास उसास पवन कूंपलटै, नाग फुनी कूं भूंच है।
सुरति निरति का बांध बेड़ा, गगन मंडल कूं कूंच है ।।28।।
साहिब प्रभु के दर्शन करने हेतु आते-जाते श्वासों ,प्राण-अपान, को
पलटकर अर्थात् प्राण-अपान को समझ कर कुण्डलिनी को जागृत करो अर्थात्
उसका मुख उपर की ओर करो। इस तरह श्वासों को सुरति निरति के
साथ जोड़ कर दशम द्वार में स्थिर करो अर्थात् सुरति को दशम द्वार में चढ़ाओ।

सुनि ले योग वियोग हंसा, शब्द महल कूं सिद्ध करो।
यौह गुरूज्ञान विज्ञान बानी, जीवत ही जग में मरो ।।29।।
हे हंस! इस योग का उपदेश सुनकर सुरति शब्द की साधना का अभ्यास
करो। यह गुरू का उपदेश पारब्रह्म का ज्ञान करवाने वाली वाणी है। जिसमें
उपदेश है कि उस पारब्रह्म का ध्यान करते हुए संसार में जीवत रहते मृतक की तरह इच्छा
 रहित हो जाओ। उस समय ही प्रभु की प्राप्ति होगी। साहिब प्रभु के सत्यलोक
 में अति सुन्दर बाग-बगीचे हैं जो शुद्ध सोने की तरह प्रकाशमान हैं। उस नाश 
रहित बाग में श्वेत भंवरे गुजार कर रहे हैं। इसलिए हे हंस ! इस संसार में 
तीव्र वैराग्य धारण करके सोहं मंत्र के अजपा 
जाप के माध्यम से मृत्यु को जीत लो।

मनसा नारी कर पनिहारी, खाखी मन जहां मालिया।
कुंभक काया बाग लगाया, फूले हैं फूल विशालिया ।।31।।
सतगुरू जी उपदेश करते हैं कि हे हंस! अपनी मनसा रूपी नारी
को पनिहारी बनाओ और खाकी मन को माली बनाओ। अपनी काया का घड़ा बनाकर, साधना
 रूपी बाग को पानी लगा कर उसेहरा-भरा करो जिससे साधना रूपी बाग में 
अच्छे-अच्छे फूल खिल जाएं अर्थात् इस शरीर में मन के द्वारा प्रभु
 के नाम की खूब उपासना करो।

कच्छ मच्छ कूरंभ धौलं, शेष सहंस फुनि गाव हीं।
नारदमुनि से रटैं निश दिन, ब्रह्मा पार न पाव हीं ।।32।।
साहिब प्रभु को कश्यप  अवतार, मच्छ अवतार और धौल जिसने पृथ्वी को अपने सींग पर
धारण किया हुआ ह, आदि सब उसका ध्यान करते हैं। पताल लोक में शेषनाग भी हज़ारों
 मुखों से उस साहिब के गुण गाते हैं। नारद मुनि जी सरीखे प्रेमा भक्ति द्वारा उसका दिन
 रात नाम रटते हैं। सृष्टि को पैदा करने वाले ब्रह्मा  जी भी प्रभु का पार नहीं पा सकते।

शंभु योग वियोग साध्या, अचल अडिग समाधि है।
अविगत की गति नहीं जानी, लीला अगम अगाध है ।।33।।
भगवान शंकर जी उस प्रभु के विरह-वियोग में योग-साधना के द्वारा अचल,
अफुर समाधि लगाते हैं। परन्तु अविगत प्रभु की गति को कोई नहीं जान सकता।
उसकी लीला अपरंम्पार है।

सनकादिक और सिद्ध चैरासी, ध्यान धरत हैं तास का।
चैबीसौं अवतार जपत हैं, परमहंस प्रकाश का ।।34।।
सनकादिक अािद संत, चैरासी सिद्ध और चैबीस अवतार भी प्रकाश स्वरूप
परमहंस साहिब प्रभु का ध्यान लगाते हैं।

सहंस अठासी और तेतीसौं, सूरज चंद चिराग हैं।
धर अंबर धरनी धर रटते, अविगत अचल विहाग हैं ।।35।।
अट्ठासी हज़ार  ऋषि और तैंतीस करोड़ देवता साहिब प्रभु का ध्यान धरते
हैं। उस प्रभु के दरबार में सूर्य-चंद्रमा दीपकों के समान है। धरती आकाश और धरती को
 धारण करने वाले भी प्रभु का नाम रटते हैं। उसकी गति को कोई नहीं जान सकता।
 वह अचल और प्रेम रूप हैं।

सुरनर मुनिजन सिद्ध और साधक, पारब्रह्म कूंरटत हैं।
घर घर मंगलचार चैरी, ज्ञान योग जहां बटत हैं ।।36।।
देवता, मानव, मुनिजन, सिद्धजन और साधक सब पारब्रह्म प्रभु के नाम का
रटन करते हैं। इन सबके घट-घट में उसी प्रभु के मंगलाचार गाए जा रहे हैं और चैरी राग
 हो रहे हैं। प्रभु के ज्ञान और योग का प्रशाद बांटा जा रहा है अर्थात् प्रभु नाम की
 ज्ञान चर्चा हो रही है।

चित्र गुप्त धर्मराय गावैं, आदि माया ¨कार है।
कोटि सरस्वती लाप करत हैं, ऐसा ब्रह्म दरबार है ।।37।।
चित्र और गुप्त जो यमराज के दूत हैं वे प्रत्येक प्राणी के बाहरी कर्म और
आन्तरिक भावना को हर समय लिखते रहते हैं। इस तरह के लेखक चित्र-गुप्त
और धर्मराज, साहिब प्रभु का गुणगान करते हैं। करोड़ों के संख्या में सरस्वती और 
आदि शक्ति भी प्रभु की उपमा गा रहे हैं। इस तरह का पारब्रह्म प्रभु का दरबार है।

कामधेनु कल्पवृक्ष जाकै, इन्द्र अनंत सुर भरत हैं।
पार्वती कर जोर लक्ष्मी, सावित्री शोभा करत हैं ।।38।।
स्वर्गलोक के राजा इंद्र देव हैं। इन्द्र देव के पास कामधेनु गाय है और
कल्पवृक्ष भी इन्द्र लोक के बाग में हैं। ऐसे देवताओं के राजा इंद्रदेव जैसे अनन्त इन्द्र 
साहिब प्रभु के दरबार में उनकी महिमा के शब्दों का गायन कर रहे हैं। पार्वती जी
लक्ष्मी जी साहिब के दरबार में करबव खड़ी हैं। सावित्री भी साहिब की 
शोभा गा रही हैं। ऐसा प्रभु का निराला दरबार है।

गंधर्व ज्ञानी और मुनि ध्यानी, पांचैं तख्त ख्वास हैं।
त्रिगुण तीन बौहरंग बाजी, कोई जन बिरले दास हैं ।।39।।
देवताओं के दरबार में रागी गन्धर्व, बड़े-बड़े ज्ञानी जन, मननशील महात्मा
ध्यानी, योगी और सृष्टि के पंच तत्व सभी मिलकर साहिब के दरबार में सेवा करते हैं। इस
 संसार में तीन गुणों के प्रभाव वाले अनेक प्राणी हैं जो सब उस प्रभु के अंश-वंश हैं। 
लेकिन कोई विरला ही उस प्रभु के दरबार में दास्य भाव में पूरा रहता है। शेष 
सब तीन गुणों के प्रभाव में आ जाते हैं।

ध्रू प्रहलाद अगाध अज्ञ हैं, जनक विदेही जोर हैं।
चले बिवान निदान बीत्या, धर्मराय की बंध तोर हैं ।।40।।
ध्रुव और प्रहलाद, साहिब प्रभु के दरबार में दासों की गिनती में है। राजा
जनक विदेही जी का दास्य भाव बहुत ज्यादा है। जो राज्य करते हुए भी विदेही
पद को प्राप्त हुए हैं। साहिब प्रभु के प्रति उनका सच्चा-सिमुरन इतना ताकतवर था कि 
जब जनक जी का विमान यमलोग के उपर से गुजरा तो नरक के सब जीवों के दुःख
 दूर हो गए। उन्हें शान्ति मिल गई जनक जी का ध्यान जब यमलोक की तरफ
 हुआ तो समस्त जीवों को दुःखी देखकर उन्हें दया आ गई। उन्होंने अपने सिमुरन के 
बल से समस्त जीवों को कर्मों की सज़ा से मुक्त करा दिया। 
धर्मराज से उनके बन्धन छुड़ा दिए।


गोरख दत जुगादि योगी, नाम जलंधर लीजिये।
भरथरि गोपीचंद सीझे, ऐसी दीक्षा दीजिये ।।41।।
गौरखनाथ जी और दतात्रेय युगों-युगों से ज्ञान योग के द्वारा प्रभु का सिमुरन करते हैं।
 योगी जालन्धर नाथ, भृतरि और गोपीचंद प्रभु के नाम में मग्न हो गए।
 महाराज जी कहते हैं कि हे प्रभु! मुझे भी ऐसा ही उपदेश दो
 कि तुम्हारे सिमुरन में सदैव लीन रहूं।

सुलतानी बाजीद फरीदा, पीपा परचे पाईया।
देवल फेर्या गोप गुसांई, नामा की छान छिवाईया ।।42।।
इब्राहीम सुल्तान, बाजीद जी और फरीद जी प्रभु साहिब के ध्यान में मग्न हो
गए हैं। राजा पीपा ने भी प्रभु का दर्शन पा लिया है। नामदेव जी की खातिर प्रभु ने
 देवल घुमा दिया और उसकी प्रेमा भक्ति से प्रसन्न होकर उसका छप्पर
भी स्वयं बांधा था।

छान छिवाई गउ जिवाई, गनिका चढ़ी बिवान में।
सदना बकरे कूंमत मारै, पौंहचे आन निदान में ।।43।।
प्रभु ने नाम देव जी का छप्पर स्वयं बाूधा और उसकी प्रार्थना सुनकर
भगवान ने राजा की मृत गाय को जीवित कर दिया था। प्रभु की कृपा से एक
गणिका विमान में बैठकर सत्यलोक को चली गई। सदना कसाई ने एक
बकरे में से उपदेश सुन कर जीव हिंसा करना छोड़ दिया था। वह भी
 भगवान प्रभु के दरबार में पहुंच गया।

अजामेल से अधम उधारे, पतित पावन विरद तास है।
केशव आन भया बनजारा, षट दल कीन्हीं हांस है ।।44।।
अजामिल, जो घोर पापी था, उसका भी संतों के उपदेश से प्रभु की शरण में
आने से उवार हो गया। प्रभु का स्वभाव अति नीच पापियों को भी पवित्र करने का
है। काशी में कबीर साहिब जी की हूसी करने के लिए षट दर्शन साधू समाज ने
झूठा शोर मचा दिया कि कबीर के घर भण्डारा है। बहुत से लोग भण्डारे में भोजन करने
 हेतु इक्ट्ठे हो गए। प्रभु परमात्मा ने कबीर साहिब जी की प्रार्थना पर केशो सेठ
 का रूप धारण कर भण्डारा संपूर्ण किया। ऐसे प्रभु की लीला अनन्त है।

धन्ना भक्त का खेत निपाया, माधो दई सिकलात है।
पंडा पाव बुझाया सतगुरू, जगन्नाथ की बात है ।।45।।
धन्ना भक्त ने कृषि में बीजने हेतु रखा बीज संतों की सेवा में लगा दिया और खेत में
 बीज की जगह कंकर बीज दिए। उसकी सेवा से खुश होकर प्रभु ने उन कंकरों से ही
 अन्न उत्पन्न कर दिया। माधो दास, प्रभु का सिमुरन करने वाले संत, जो जगन्नाथपुरी
 के समीप रहते थे। उन्हें रात्रि में तीव्र दस्त लग गए। माधो दास को सर्दी से बचाने
 हेतु भगवान जगन्नाथ ने अपना ओढ़ा हुआ दोशाला बीमार संतों पर ओढ़ा दिया।
 जिससे उन संतों की महिमा का गायन हुआ। मुगल बादशाह सिंकदर लोधी के 
दरबार में सतगुरू कबीर साहिब जी गए। वहाँ दरबार में बैठे हुए अपने कमण्डल
 का जल हरि-हरि कहते हुए अपने चरणों पर डाल लिया। बादशाह के पूछने पर
 सतगुरू जी ने बताया कि जगन्नाथ पुरी में एक पण्डे के पैर पर उबलता हुआ 
पानी पड़ गया था। हमने उसका पाँव जलने से बचाया है।। राजा ने इस बात की तफतीश
 की तो यह बात सत्य निकली ऐसे सतगुरू देव जी की अन्तरयामता 
देखकर राजा अति श्रद्धावान हो गया।

भक्ति हेत केशव बनजारा, संग रैदास कमाल थे।
हे हरि हे हरि होती आई, गूंनि छई और पाल थे ।।46।।
भक्ति से प्रसन्न होकर कबीर साहिब का भण्डारा करने हेतु साहिब प्रभु
केशो बनजारे का रूप धारण कर काशी में कबीर साहिब जी के घर आए। कबीर
साहिब जी, सन्त रविदास और कमाल जी के साथ साहिब का गुण गान कर रहे थे।
बैलों पर भण्डारे की सामग्री लाद कर हे हरि हे हरि ;बैलों को हाूकने का शब्दद्ध करते हुए 
आए और भण्डारा पूर्ण किया। सतगुरू साहिब जी की महिमा अपरम्पार है।

गैबी ख्याल विशाल सतगुरू, अचल दिगंबर थीर है।
भक्ति हेत काया धर आये, अविगत सत्य कबीर है ।।47।।
अविगत पुरूष अपनी भक्ति के हित कारण सतगुरू कबीर के रूप में काया
धारण करके आए। ऐसे विशाल सतगुरू जो ईश्वरीय शक्ति के साथ
समस्त विश्व में व्याप्त हैं। वह अचल और धीर है। वह निराकार हैं।

नानक दादू अगम अगाधू, तिरी जिहाज खेवट सही।
सुख सागर के हंस आये, भक्ति हिरम्बर उर धरी ।।48।।
श्री नानक साहिब जी और श्री दादू साहिब जी की गति भी अपरम्पार है
जिन्होंने प्रभु से बिछुड़े हुए अनेक जीवों को भक्ति का उपदेश देकर उनका उवार किया है।
 कुशल मल्लाह बनकर अनेक प्राणियों की डूबती नैया को तारा है। ये सुखसागर 
के हंस, हहृय  में प्रभु की भक्ति धारण करके विश्व में अवतरित हुए।

कोटि भानु प्रकाश पूर्ण, रूंम रूंम की लार है।
अचल अभंगी हैं सति संगी, अविगत का दीदार है ।।49।।
सतगुरू कबीर जी, जिनके शब्द स्वरूप शरीर के एक-एक रोम में करोड़ों
सूर्यों का प्रकाश हो रहा है। ऐसे सतगुरू अचल और अभंगी हैं और सत्य स्वरूप करके सबमें विराजमान हैं। सतगुरू कबीर साहिब का दर्शन, मानो अवगत पुरूष का ही दर्शन है।

धन्य सतगुरू उपदेश देवा, चैरासी भ्रम मेट हीं।
तेज पुंज तन देह धरि करि, इस विधि हम कूं भेट हीं ।।50।।
महाराज गरीबदास जी कहते हैं कि हे मेरे उपदेश देवा गुरू देव! आप धन्य
हो। आपने उपदेश देकर मेरे चैरासी के कर्म-भ्रम सब मिटा दिए हैं। हे सतगुरू जी! आप 
तेजपुंज प्रकाश का शरीर धारण करके हमें आकर मिले। अतिकृपा करके 
हमें ऐसे रूप में आपका दर्शन हुआ।

शब्द निवास अकाश वाणी, यौह सतगुरू का रूप है।
चन्द सूर नहीं पवन पानी, ना जहां छाया धूप है ।।51।।
ऐसे सतगुरू देव जी का शब्द स्वरूप रूप हैं और समस्त जगह मौजूद वाणी
है अर्थात् शब्द करके समस्त संसार में वही बोल रहे हैं। ऐसे शब्द निवासी अविगत पुरूष
 के सुन्न मण्डल में न चंद्रमा है, न सूर्य है, न ही हवा और पानी है, न ही वहां 
छाया या धूप हैं अर्थात् संसार के सुख-दुख गर्मी-सदी आदि कुछ भी नहीं है।

रहता रमता राम साहिब, अविगत अलह अलेख है।
भूले पंथ विटंब वादी, कुल का खाविंद एक है ।।52।।
ऐसा शब्द रूप पारब्रह्म अविगत पुरूष सारी सृष्टि में रमा हुआ राम है।
संसार में अनेक मतवादी सम्प्रदाय के लोग भूले हुए हैं जो अपने-अपने मतानुसार उस 
साहिब प्रभु को अलग-अलग करके मानते हैं, जबकि समस्त
 सृष्टि का स्वामी कुल मालिक एक है।

रूंम रूंम में जाप जप ले, अष्ट कंवल दल मेल है।
सुरति निरति कूं कंवल पठवौ, जहां दीपक बिन तेल है ।।53।।
सतगुरू जी उपदेश करते हैं कि ऐसा सबका एक मालिक जो तुम्हारे शरीर
के समस्त कमलों में समाया हुआ है ऐसे प्रभु का नाम रोम-रोम में जाप कर अर्थात् नाभि में परावाणी की धुन से प्रभु के नाम का जाप कर। अपनी सुरति-निरत को नाम से जोड़कर
 त्रिकुटी कमल में स्थिर कर जहाँ बिन तेल, बाती के प्रभु की ज्योति का दीपक जल रहा है।

हरदम खोज हनोज हाजिर, त्रिवैणी के तीर हैं।
दास गरीब तबीब सतगुरू, बंदीछोड़ कबीर हैं ।।54।।
सतगुरू गरीब दास महाराज जी कहते हैं कि हे हंस! ऐसे प्रभु की प्रत्येक
श्वास से खोज कर। वह तुम्हारे त्रिकुटी कमल में हाज़िर नाज़िर विराजमान है। ऐसे

तबीब सतगुरू साहिब बन्दी छोड़ (जन्म-मरण का बन्धन काटने वाले) कबीर साहिब हैं। 
ऐसे सतगुरू जी का प्रत्येक श्वास से सुमिरन कर।

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