Sunday, May 21, 2017

गुरूदेव का अंग (सरलार्थ)

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गरीबप्रपट्टन परलोक हैजहां अदली सतगुरू सार। 
भक्ति हेत से ऊतरेपाया हम दीदार ।।1।।
सब लोकों से पर उतम लोक है, जिसे सत्यलोक कहते हैं। इस उतम लोक में 
अदली (न्यायकर्ता) सत्यपुरूष सतगुरु कबीर साहिब जी विराजमान हैंजो समस्त 
सृष्टि के सार हैं। संसार के प्राणियों के लिए भक्ति का हित करके सतगुरु 
जी इस मृत्यु लोक में उतरे। ऐसे सतगुरु का हमने दर्शन पाया।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्याअलल पंख की जात । 
काया माया ना उहांनही पिंड नही गात ।।2।।
सतगुरु कबीर साहब जी हमें इस तरह मिलेजिस तरह अलल पंखी  (अलल पक्षी) 
अपने बच्चे को हित करके मिलता है। सतगुरु जी हमें आकाश मंडल में मिले। 
उस लोक में पांच तत्वों का जड़ शरीर आदि नहीं है अर्थात् 
आत्म-तत्व के माध्यम से ही हमारा मिलन हुआ है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्याउजल हिरंबर आदि। 
भलका ज्ञान कमान का घालत है सर सांधि ।।3।।
हमें अदली पुरूष कबीरऐसा सतगुरु मिला जो प्रकाश रूप और निर्मल है। उस
 सतगुरु ने हमारे मन में ज्ञान रूपी कमान उपर चढ़ा कर ऐसा बाण  मारा 
जिससे समस्त कर्म-भ्रम नष्ट होकर मन में शुव प्रकाश प्रकट हो गया।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यासुन्न विदेशी आप।
रूम रूम प्रकाश हैदीन्हा अजपा जाप ।।4।।
सतगुरु जी कह रहे हैं कि हमें ऐसे सतगुरु मिलेजो सुन्न (शून्य) देश (सत्यलोक)
 में रहते हैं। उनके रोम-रोम में प्रकाश है। ऐसे सतगुरु देव जी
 ने हमें अजपा जाप का उपदेश दिया है जो बिना जपे ही हर समय
 रोम-रोम में से उच्चारण होता है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यामगन किये मुसताक। 
प्याला प्याया प्रेम कागगन मंडल गरगाप।।5।।
हमें ऐसे समर्थ सतगुरु मिले कि उनके मिलने से हम संसार को भूल कर सतगुरु 
जी के प्रेम में मस्त हो गए। उन्होंने हमें ऐसा प्रेम का प्याला पिलाया 
कि हमारी सुरति गगन मण्डल में लीन हो गई।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यासिंधु सुरति की सैन। 
उर अंतर प्रकाशियाअजब सुनाये बैन ।।6।।
हमें ऐसा सतगुरु मिलाजिसने सुरति शब्द का ध्यान करने का संकेत दे दिया। 
इस सुरति शब्द का ध्यान करने से हमारे मन में प्रकाश हो गया। 
ऐसा अनुपम उपदेश हमें सुना दिया है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यासुरति सिंधु की सैल। 
बजर पौलि पट खौल करले गया झीनी गैल ।।7।।
सुरति रूपी सागर में हमें ऐसे सतगुरु मिल गएजिन्होंने दशम द्वार में लगे हुए
 पक्के द्वार (किवाड) खोल दिये और हमें अति बारीक रस्ते में से अपने धाम में ले गए।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यासुरति सिंधु के तीर । 
सब संतन सिरताज हैसतगुरू अदल कबीर ।।8।।
हमें सुरति रूपी सागर के किनारे पर ऐसा सतगुरु मिल गया जिसका नाम अदली 
पुरूष कबीर है। वह सब संतों का सिरताज है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यासुरति सिंधु के मांहिं। 
शब्द सरूपी अंग हैपिंड प्राण नहीं छाहिं।।9।।
हमें सुरति रूपी सागर में ऐसे सतगुरु मिल गए जिनके शरीर के अंग शब्द स्वरूप हैं। 
उनका शरीरप्राण और छाया कुछ भी नहीं है अर्थात् उनका पॅच भौतिक
 शरीर नहीं है बल्कि प्रकाश रूप और शब्द रूप है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यागलताना गुलजार । 
वार पार कीमत नहींनहीं हलका नहीं भार ।।10।।
हमें ऐसे सतगुरु मिले हैं जो सारी सृष्टि में लीन होकर पल्लवित पुष्पों की तरह
 शोभा दे रहे हें। उनका कोई उरवार-पार नहीं है। उनकी कोई कीमत नहीं पा 
सकता और न ही उन्हें हल्का या भारी कहा जा सकता है। ऐसे शब्द स्वरूपी हैं सतगुरु।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यासुरति सिंधु के मंझ। 
अंड्यों आनन्द पौष हैबैन सुनाये कुंज ।।11।।
सुरति रूपी सागर में हमें ऐसे सतगुरु मिल गए जैसे कुंज पक्षी अपने ध्यान और 
आवाज़ से बहुत दूर पड़े अण्डों को पालता है। इसी तरह सतगुरु 
भी अपनी कृपा-दृष्टि के द्वारा हमारा पालन-पोषण करते हैं।

गरीब ऐसा सतगुरू हम मिल्यासुरति सिंधु के नाल । 
पीतांबर ताखी धरयौबानी शब्द रिसाल ।।12।।
सुरति रूपी सागर में हमें ऐसे सतगुरु मिले हैं जिन्होंने अपने सूक्ष्म शरीर पर
 पीताम्बर (पीले कपड़े) धारण किये हैं। उनकी वाणी के शब्द प्रेम-रस से परिपूर्ण है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यासुरति सिंधु के नाल। 
गमन किया परलोक सेअलल पंख की चाल ।।13।।
सुरति रूपी सागर के बीच हमें ऐसे सतगुरु मिल गए हैं जिन्होंने हमें अपने सत्लोक में
 इस तरह बुला लिया है जिस तरह अलल पक्षी अपने बच्चों को सुन्न मण्डल 
में अपनी सुरति के ज़ोर से बुला लेता है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यासुरति सिंधु के नाल।
ज्ञान जोग अरू भक्ति सबदीन्ही नजर निहाल ।।14।।
सुरति रूपी सागर में हमें ऐसे सतगुरु जी मिल गए हैं जिन्होंने ज्ञान योग और भक्ति 
योग देकर अपनी दया दृष्टि से हमें निहाल कर दिया है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्याबेपरवाह अबंध। 
परमहंस पूर्ण पुरूषरोम रोम रविचन्द ।।15।।
हमें ऐसे निर्भय सतगुरु मिल गए हैं जिनके उपर किसी की भी हकूम अथवा 
प्रतिबन्ध नहीं है। ऐसे परम हंस पूर्ण पुरूष सतगुरु हैंजिनके 
रोम-रोम में सूर्य और चंद्रमा चमकते हैं।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्याहै जिन्दा जगदीश।
सुन्न विदेशी मिल गयाछत्र मुकुट है शीश ।।16।।
हमें ऐसे सतगुरु मिल गए हैं जो समस्त सृष्टि के मालिक हैं। वे अमर हैं। इसी 
कारण उनका नाम जिन्दा-जगदीश है। ऐसे सुन्नि मण्डल सत्लोक में रहने वाले 
सतगुरु मिल गए हैं जिनके शीश पर छत्र और मुकुट शोभायमान हैं।

गरीबसतगुरू के लक्ष्ण कहूँमधुरे बैन विनोद ।
चार वेद षट शास्त्रकहाँ अठारा बोध ।।17।।
ऐसे सतगुरु देव जी के गुणों का वर्णन करता हूं जिनके वचन मधुररस भरपूर हैं 
और आनन्द देने वाले हें। उनके ऐसे सार वचन हैं कि चार वेदछः शास्त्र और
 अठारह पुराण भी नेति-नेति कर थक जाते हैं।

गरीबसतगुरू के लक्षण कहूँअचल विहंगम चाल ।
हम अमरापुर ले गयाज्ञान शब्द सर घाल ।।18।।
मैं सतगुरु देव जी के गुणों का वर्णन करता हूं कि वे अचल हैस्थिर हैउनकी चाल 
पक्षी की तरह तेज़ और सीधी है। ऐसे सतगुरु देव जी ने हमारे मन में ज्ञान
 रूपी वाण मारकर अज्ञान का नाश कर दिया और हमें अमर लोक में ले गए।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यातुरिया केरे तीर ।
भगल विद्या बानी कहैंछानै नीर अरू क्षीर ।।19।।
हमें तुरीय अवस्था ,ज्ञानी की चतुर्थ अवस्थामें ऐसे सतगुरु मिल गए हैं जो भगल 
विद्या की वाणी उच्चारण करते हैं जिससे सार और असार का ज्ञान होता है।

गरीबजिंदा जोगी जगतगुरूमालिक मुरशद पीव।  
काल कर्म लागै नहींनहीं शंका नहीं सीव ।।20।।
सतगुरु देव जी ज़िन्दा जोगी (जन्म-मरण से रहित) है कुल दुनिया के मालिक हैं
 और सबके गुरू मुर्शिद और पीव  हैं उनके उपर काल और कर्म का कोई प्रभाव
 नहीं होतान ही उन्हें कोई शंका या भ्रम होता है।

गरीबजिन्दा जोगी जगतगुरूमालिक मुरशद पीर ।
दहूँ दीन झगरा मंड्यापाया नहीं शरीर ।।21।।
सतगुरु देव जो हमेशा ज़िंदा रहने वाले जगत-गुरूमालिकमुर्शिद और पीर है। जब
 सतगुरु कबीर साहिब जी काशी नगर को त्याग कर मगहर में अलोप होने के लिए
 गए तो दोनों ही दीन (हिन्दू और मुसलमान) जो सतगुरु देव जी को गुरू
 मानते थेउनमें आपसी झगड़ा हो गया। वे उनके शरीर का अपनी-अपनी
 रीति अनुसार दफन और संस्कार करने के लिए हठ कर रहे थे। परन्तु सतगुरु
 देव जी का अन्त समय शरीर ही नहीं मिला। इस तरह दोनों कौमों का 
झगड़ा समाप्त हो गया। दो चादरें और फूल मिले जो दोनों कौमों ने
 आधे-आधे बांट लिए और अपनी-अपनी रीति अनुसार अंतिम लिया की।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यामालिक मुरशद पीर। 
मार्या भलका भेद सेलगे ज्ञान के तीर ।।22।।
हमें ऐसा सतगुरु मिला है जो सबका मालिक है और गुरू पीर है। उसने हमारे
 मन में ऐसा भेद ज्ञान का तीर मारा जिससे हमें अपने स्वरूप का ज्ञान हो गया।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यातेज पुंज के अंग ।
झिलमिल नूर जहूर हैरूप रेख नहीं रंग ।।23।।
हमें ऐसे सतगुरु मिले हैं जिनके शरीर के अंग तेज पुंज के हैं। ऐसे तेज़ पुंज के
 शरीर में झिलमिल-झिलमिल करता नूर झलक रहा है। ऐसे प्रकाश स्वरूप
 शरीर का कोई रूपरेखा और रंग नहीं है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यातेज पुंज की लोय।
तन मन अरपौं शीश कूँहोनी होय सो होय ।।24।।
हमें ऐसे सतगुरु मिले हैं जो तेज़ पुंज प्रकाश रूप हैं। ऐसे प्रकाश स्वरूप् सतगुरु को
 मैं अपना तनमन धन अर्पित करता हूं। चाहे कुछ भी हो इसकी हमें कोई परवाह नहीं।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्याखोले बजर किवार।
अगम द्वीप कूँ ले गयाजहां ब्रह्म दरबार ।।25।।
हमें ऐसे सतगुरु जी मिल गए हैं जिन्होंने दशम द्वार में लगे हुए बज्र किवाड़ 
अपनी कृपा से खोल दिए हैं और हमें सत्यलोक में पार ब्रह्म प्रभु के दरबार
 में पहुंचा दिया हैजहां किसी की पहुंच नहीं है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्याखोले बजर कपाट।
अगम भूमि कूँ गम करीउतरे औघट घाट ।।26।।
हमें ऐसा सतगुरु मिल गया है जिसने दशम-द्वार के दरवाज़े खोल दिए हैं। 
सतगुरु की कृपा से अगमलोक (जहां किसी की पहंच नहीं) में प्रविष्ट 
हो गए हैं जो दुर्गम घाटी है। उसे हमने पार कर लिया है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यामारी ग्यासी गैन।
रोम रोम में सालतीपलक नहीं है चैन ।।27।।
हमें ऐसा सतगुरु मिल गया है जिसने ज्ञान रूपी ज्ञयासी (एक नोकीला हथियार
जो दुश्मन के पेट की आंतें खींच लेता है) ऐसी मारी हैजिससे हमारे रोम-रोम में 
प्रभु को मिलने की तड़प इतनी ज्यादा हो गई है कि पल भर
भी हमें उसके बिना चैन नहीं मिल रहा है।

गरीबसतगुरू भलका खैंच करिलाया बान जु एक । 
स्वांस उभारे सालतापड्या कलेजे छेक ।।28।।
सतगुरु देव जी ने ज्ञान रूपी कमान से शब्द रूपी बाण खींच कर ऐसे मारा कि
 मेरे मन में छेद हो गया। अर्थात् प्रभु को मिलने की बेचैनी पैदा हो गई। 
शरीर में आते जाते स्वास प्रभु को मिलने हेतु हर पल बेचैन रहने लगे।

गरीबसतगुरू मारया बान कसिखैबर ग्यासी खैंच।
भरम कर्म सब जरि गयेलई कुबुधि सब ऐंच ।।29।।
सतगुरु देव जी ने शब्द स्वरूप बाणखैबर और ग्यासी इस तरह खींच कर मारे 
कि उससे मेरी सारी कुबुवि हर ली। मेरे समस्त
 भ्रम और कर्म आदि दोष जल गए।

गरीबसतगुरू आये दया करिऐसे दीन दयाल।
बंदीछोड़ बिरद तास काजठर अग्नि प्रतिपाल ।।30।।
सतगुरु देव जी हम पर दया कर प्रकट हुए। वे ऐसे दीन दयाल हैं जो दीन-दुखियों पर
 दया करते हैं। उस सतगुरु देव जी का नाम बन्दी छोड़ है। जीव के बन्धन छुड़ाना
 ही उनका बिरद है। वही माता के गर्भ में जठराग्नि से
 जीव की रक्षा और पालन करते हैं।

गरीबजठर अग्नि से राखियाप्याया अमृत खीर ।
जुगन जुगन सतसंग हैसमझ कुट्टन बेपीर ।।31।।
सतगुरु देव जी माता के गर्भ में जठराग्नि से प्राणी की रक्षा करते हैं और अमृतमय 
दूध पिला कर पालन करते हैं। हे मनमुख कुटिल प्राणी! उस सतगुरु की कृपा 
को समझ जो सतगुरु युगों-युगों से तेरे सदैव अंग-संग रहते हैं। सतगुरु जी 
हर प्रकार से तेरी रक्षा करते हैं। उनके चरण कंवलों का ध्यान कर।

गरीबजूनी संकट मेटि हैऔंधे मुख नहीं आय।
ऐसा सतगुरू सेईयेजम से लेई छुड़ाय।।32।।
हे प्राणी! सतगुरु जीव का चैरासी लाख योनियों का संकट समाप्त कर देते हें। फिर
 वह प्राणी माता के गर्भ में उल्टा लटका हुआ जन्म नहीं लेता। ऐसे भयानक 
दुःख से छुड़ा लेने वाले सतगुरु की तू शरण में आ जा। उनकी
 सेवा कर। वह तुम्हें यमदूतों से भी छुड़ा लेंगे।

गरीबजम जौरा जासें डरैधर्मराय के दूत।
चैदह कोटि न चंप हींसुन सतगुरू की कूत ।।33।।
सतगुरु देव जी कहते हैं कि धर्मराज के दूत यम जौरा इत्यादि की सेना चैदह करोड़
 हैवे सब सतगुरु साहिब जी से डरते हें। जो सतगुरु साहिब जी का सेवक
 हैउसके मुख से सतगुरु देव जी के नाम की
 गुंजार सुनकर उसके पास नहीं आते।

गरीबजम जौरा जासें डरैंधर्मराय धर धीर।
ऐसा सतगुरू एक हैअदली अदल कबीर ।।34।।
यमजौरा इत्यादि जिससे डरते हैं और धर्मराज भी जिसके आगे 
धैर्य धारण कर प्रार्थना करता है। ऐसे सतगुरु साहिब समस्त
 सृष्टि में एक हैंवे अदली पुरूष कबीर जी हैं।

गरीबजम जौरा जासें डरैंमिटे कर्म के अंक।
कागज कीरै दरगह दईचैदह कोटि न चंप ।।35।।   
ऐसे सतगुरु कबीर साहिब से यम और उसकी सेना सब डरते हैं। जो सतगुरु 
देव जी का सेवक हैउसके कर्मों के लेख सतगुरु जी मिटा देते हैं। धर्मराज के 
दरबार में चित्रगुप्त के लिखे हुए कर्मों के लेख के कागज़ सतगुरु जी फाड़ देते हैं।

गरीबजम जौरा जासें डरैंमिटे कर्म के लेख।
अदली अदल कबीर हंैकुल के सतगुरू एक ।।36।।
यम और उसकी सेना के यमदूत जिससे डरते हैंजो सेवक के कर्मों के लेख
 मिटा देते हैं। ऐसे अदली पुरूष कबीर कुल दुनिया के मालिक हैं।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्यापहूँच्या मंझ निदान।
नौका नाम चढ़ाय करपार किये प्रवान ।।37।।
संसार रूपी भव सागर में डूबते हुए हमें ऐसे खेवट सतगुरु जी मिल गए,
 जिन्होंने नाम के जहाज़ पर चढ़ा कर पार कर दिया है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्याभवसागर के माहिं।
नौका नाम चढ़ाय करिले राखे निज ठाहिं।।38।।
संसार रूपी भवसागर में ऐसे सतगुरु हमें मिल गए जिन्होंने नाम के जहाज
 पर चढ़ा कर हमें अपने निजधाम में पहुंचा दिया है।

गरीबऐसा सतगुरू हम मिल्याभवसागर के बीच।
खेवट सब कूँ खेवताक्या उत्तम क्या नीच ।।39।।
संसार रूपी भवसागर में हमें ऐसा सतगुरु मिल गया जो भवसागर से पार करने
 वाला मल्लाह है। जो इस मल्लाह के बेड़े में बैठ जाता हैचाहे वह धर्मी है
चाहे वह पापी हैसतगुरु देव जी बिना भेदभाव के सबको पार कर देते हैं।

गरीबचैरासी की धार मेंबहे जात हैं जीव।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याले परसाया पीव ।।40।।
इस संसार रूपी भवसागर में जन्म मरण रूपी चैरासी लाख धाराएं हैं जिनमें अनेक 
जीव बहते जा रहे हैं। परन्तु हमे इस संसार रूपी भवसागर में ऐसा
 सतगुरु मिल गया है जिसने हमारा पीव से मेल करा दिया है।

गरीबलख चैरासी धार मेंबहे जात है हंस।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याअलख लखाया बंस ।।41।।
इस संसार सागर में जन्म-मरण रूपी चैरासी लाख धाराएं हैं जिसमें अनेक जीवात्मा 
रूपी हंस बहे जा रहे हैं परन्तु हमें ऐसे सतगुरु मिल गए हैंजिन्होंने हमें 
अपने वंश में मिला लिया है अर्थात्अलख पुरूष के दर्शन करा दिए हैं।

गरीबमाया का रस पीव करफूटि गये दो नैन ।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याबास दिया सुख चैन ।।42।।
इस संसार की माया का रस पीकर अनेक प्राणियों के ज्ञान ओर विवेक रूपी 
दो चक्षु फूट गए हैं अर्थात् माया के मद में जीव अन्धे हो गए हैं। परन्तु हमें 
ऐसा सतगुरु मिल गया है जिसने इस माया के मद से छुड़ा 
कर सुख शान्ति में हमारा निवास करा दिया है।

गरीबमाया का रस पीय करहो गये डामा डोल ।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याज्ञान जोग दिया खोल ।।43।।
इस संसार में अनेक प्राणी माया के नशे में इस प्रकार डामांडोल हो गए हैं 
कि उन्हें अपने मालिकप्रभु-परमात्मा की याद भूल गई है। परन्तु 
हमें ऐसे सतगुरु मिल गए हैं जिन्होंने ज्ञान योग के द्वारा अपने निजधाम
 का द्वार हमारे लिए खोल दिया है।

गरीबमाया का रस पीय करहो गये भूत खईस ।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याभक्ति दई बख्शीश ।।44।।
इस संसार की माया का नशा पीकर अनेक प्राणी भूत प्रेत की जून में चले गये हैं। 
परन्तु हमें ऐसे सतगुरु मिल गये हैं जिन्होंने हमें भक्ति की
 बख्सीस देकर अपने निज स्रूप में मिला लिया है।

गरीबमाया का रस पीय करफूट गये पट चार।
ऐसा सतगुरू हम मिल्यालोयन संख उधार ।।45।।
इस संसार में माया का नशा पीकर अनेक प्राणियों की दो बाहर और दो अन्दरूनी 
ज्ञानविवेक रूपी आंखें फूट गई हैं। परन्तु हमें ऐसे सतगुरु मिल गए हैं 
जिन्होंने हमारे ज्ञान रूपी अनेकों दिव्य नेत्र खोल दिए हैं। जिससे
 हमारा अज्ञान रूपी अन्धकार दूर हो गया है।

गरीबमाया का रस पीय करडूब गये दहूं दीन।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याज्ञान जोग प्रवीन ।।46।।
संसार की माया का नशा पीकर दोनों ही दीनों के अनेकों प्राणी संसार सागर 
में डूब गए हैं। परन्तु हमें ऐसे सतगुरु मिल गए हैं जो ज्ञान और योग में
 पूर्णतः निपुण हैं। उनकी कृपा से हमारे उपर इस संसार 
की माया का कोई प्रभाव नहीं हो सकता।

गरीबमाया का रस पीय करगये षट् दल गारत गोर।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याप्रगट लिये बहोर ।।47।।
संसार की माया का नशा पीकर षट्दल ,छः भेखभी अपने मार्ग से भटक गए हैं 
परन्तु हमें ऐसे सतगुरु मिल गए हैंजिन्होंने प्रकट होकर
 हमें संसार सागर में डूबने से बचा लिया है।

गरीबसतगुरू कूं क्या दीजियेदेने को कछु नाहिं।
समन कूं साका कियासेऊं भेंट चढाहिं ।।48।।
ऐसे सतगुरु को हम क्या दे सकते हैंक्योंकि हमारे पास उन्हें देने योग्य कोई वस्तु
 नहीं है। सतगुरु जी के उपकार के बदले में सम्मन ने बहुत बड़ा साका 
कर दिया। उसने अपने इकलौते पुत्र सेउ को भी सतगुरु की भेंट चढ़ा दिया।

गरीबसिर साटे की भक्ति हैऔर कछु नही बात।
सिर के साटे पाईयेअविगत अलख अनाथ।।49।।
सतगुरु साहिब जी की भक्ति सिर के सोदे से ही मिलती है। कोई अन्य पदार्थ उसकी
 कीमत नहीं है। सिर का सौदा करने से ही उस अविगत अलख पुरूष को पाया
 जा सकता है अर्थात् अपना अहंकार त्याग कर विनम्र उसकी भक्ति करने 
से ही उसे पाया जा सकता है।

गरीबशीश तुम्हारा जायेगाकर सतगुरू कूं दान। 
मेरी मेरा छाड़ देयौही गोय मैदान ।।50।।
हे प्राणी! तेरा शीश एक दिन चला जाएगा। अर्थात् मौत इसे मिट्टी में मिला देगी। 
इसलिए तू अपना शीश सतगुरु को दान कर देभाव अपना अहंकार छोड़कर सतगुरु
 का सेवक बन जा। संसार के पदार्थों का ममत्व त्याग दे तभी तुझे सतगुरु की 
भक्ति प्राप्त होवेगी। इस संसार रूपी मैदान में इस प्रकार 
की रहनी से ही जीत प्राप्त होगी।

गरीबशीश तुम्हारा जायेगाकर सतगुरू की भेंट।
नाम निरंतर लीजियेजम की लगै न फेंट ।।51।।
हे प्राणी! तेरा शीश एक दिन चला जाएगामौत हो जाएगी। इसको लेखे में लगाने
 के लिए पहले ही सतगुरू की भेंट चढ़ा दे अर्थात् अपने अहंकार को त्याग 
कर सतगुरू साहिब का नाम लगातार जप ले। इससे यमों की मार से बच जाएगा।

गरीबसाहिब से सतगुरू भयेसतगुरू से भये साध।
ये तीनो अंग एक हैगति कुछ अगम अगाध ।।52।।
सतगुरू गरीब दास महाराज जी फरमाते हैं कि कुल मालिक साहिब ने ही सतगुरू जी
 का रूप धारण किया है और सतगुरू जी ही सत्यवादी साधू बन कर आए हैं। ये
 तीनों स्वरूप अलग-अलग होते हुए भी एक ही रूप में हैं। इन तीनों की गति 
अपरम्पार है। इनकी महिमा को जानना बहुत कठिन है।

गरीबसाहिब से सतगुरू भयेसतगुरू से भये संत।
धर धर भेष विशाल अंगखेलैं आदि अरू अंत ।।53।।
साहिब प्रभु ने ही सतगुरू जी का रूप धारण किया है और सतगुरू ही सन्त रूप में 
आए हैं। साहिब बारम्बार ऐसे रूप धारण कर सृष्टि के आदि से लेकर अंत तक
 आते जाते रहते हैं। सृष्टि में प्रभु का ऐसा ही खेल है।

गरीबऐसा सतगुरू सेईयेबेग उतारे पार।
चैरासी भ्रम मेट हींआवा गवन निवार ।।54।।
ऐसे सतगुरू की सेवा और उपासना करोजो तुरंत संसार सागर से पार उतार दे। 
चैरासी लाख योनियों के चक्कर को समाप्त करके अर्थात्
 जन्म-मरण का दुःख समाप्त कर दे।

गरीबअंधे गूंगे गुरू घनेंलंगड़े लोभी लाख। 
साहिब से परचे नहींकाब बनावैं साख ।।55।।
संसार में ढोंग रचने वाले अन्धेगूंगेलंगड़े और लोभी लाखों गुरू बने हुए हैं 
अर्थात् ज्ञान और विवेक से खाली हैं। जिनका साहिब प्रभु से कभी मेल 
नहीं हुआ। केवल दोहेसाखियाॅ बोल कर सुनाते हैं।

गरीबऐसा सतगुरू सेईयेशब्द समाना होय।
भवसागर में डूबतेपार लंघावै सोय ।।56।।
ऐसे सतगुरू साहिब की सेवा-उपासना करनी चाहिए जो बह्म शब्द में लीन रहता हो। 
ऐसे सतगुरू ही संसार सागर में डूबते हुए प्राणी को पार लगा सकते हैं।

गरीबऐसा सतगुरू सेईयेसोहं सिन्धु मिलाप।
तुरिया मध्य आसन करैंमेटंै तीन्यू ताप ।।57।।
ऐसे सतगुरू की सेवा-उपासना करनी चाहिये जो सुरति-शब्द का मेल करा दें और
 तुरीया (ज्ञान की चतुर्थ अवस्था) में पहुंचा दे। चार अवस्थाएं इस प्रकार हैं - 
(जागृतस्वप्नगहन निद्रा और तुर्रीया जो सदैव ज्ञानमय अवस्था है) आदि
 दैविकआदि भौतिक और आदिआत्म तीनों ताप मिटा दें।

गरीबतुरिया पर पुरिया महलपारब्रह्म का देश।
ऐसा सतगुरू सेईयेशब्द विज्ञाना नेश ।।58।।
सतगुरू जी कहते हैं कि तुरीया से आगे पांचवीं अवस्था तुरीयातीत अवस्था है जिसमें 
पहुंच कर प्राणी उस पारब्रह्म के देश में पहुंच जाता है। इसे सतगुरू जी ने
 पुरीय (पूर्ण) अवस्था कहा है। ऐसे सतगुरू जी की शरण लेनी चाहिए 
जो ब्रह्म शब्द में लीन रहता हो। ऐसे सतगुरू की कृपा से ही 
प्राणी पारब्रह्म के देश में पहुॅच सकता है।

गरीबतुरिया पर पुरिया महलपारब्रह्म का धाम।
ऐसा सतगुरू सेईयेहंस करै निहकाम।।59।।
तुरीया से आगे तुरियातीत अवस्था में ही पारब्रह्म का धाम है। ऐसे सतगुरू की 
शरण लेनी चाहिए जो प्राणी को सब इच्छाओं से
 रहित करके पारब्रह्म के धाम में ले जाएं।

गरीबतुरिया पर पुरिया महलपारब्रह्म का लोक।
ऐसा सतगुरू सेईयेहंस पठावै मोख ।।60।।
तुरीया से उपर तुरीयातीत अवस्था में ही प्राणी पारब्रह्म के लोक में जाता है। 
हमें ऐसे सतगुरू की शरण लेनी चाहिए जो जीव को जन्म-मरण के 
चक्कर से छुड़ा कर मोक्ष की पदवी हासिल करा देवे।

गरीबतुरिया पर पुरिया महलपारब्रह्म का दीप।
ऐसा सतगुरू सेईयेराखै संग सनीप ।।61।।
तुरीया से आगे तुरीयातीत अवस्था में ही प्राणी पारब्रह्म के द्वीप में पहुंचता है।
 इसलिए जिज्ञासू को ऐसे सतगुरू की शरण लेनी चाहिए 
जो प्राणी को सदैव अंग संग रखे।

गरीबगगन मंडल गादी जहांपारब्रह्म अस्थान।
सुन्नि शिखर के महल मेंहंस करैं विश्राम।।62।।
गगन मण्डलजिसे सुन्न मण्डल या सत्यलोक कहते हैवही पारब्रह्म प्रभु का 
स्थान है। वही सुन्न (शून्य)  शिखिर अर्थात् सत्लोक प्रभु का महल है जो मालिक
 का सिंहासन है। सतगुरू की शरण लेने वाले हंस इस लोक 
में सुख और शान्ति प्राप्त करते हैं।

गरीबसतगुरू पूर्णब्रह्म हैंसतगुरू आप अलेख।
सतगुरू रमता राम हैंयामैं मीन न मेख ।।63।।
श्री गरीबदास महाराज जी कहते हैं कि सतगुरू जी ही पूर्ण ब्रह्म हैं। सतगुरू 
जी ही स्वयं आलेख पुरूष हैं। सतगुरू जी ही सारे संसार में राम रूप में रमे 
हुए हैं। इसमें मीन-मेख (किन्तु-परन्तु) के लिए कोई स्थान नहीं।

गरीबसतगुरू आदि अनादि हैंसतगुरू मध्य हैं मूल।
सतगुरू कूं सिजदा करूंएक पलक नहीं भूल ।।64।।
सतगुरू देव जी ही आदि सनातन हैं। सतगुरू देव जी ही अनादि हैं। सृष्टि के मध्य 
में भी सतगुरू जी ही बिराजमान हैं। सृष्टि का मूल भी वही है। ऐसे सतगुरू देव
 जी को मैं एक पल के लिए भी नहीं भूलता हुआ सदैव उन्हें नमस्कार करता हूं।

गरीबपट्टन घाट लखाईयाँअगम भूमि का भेद।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याअष्ट कमल दल छेद।।65।।
हमें ऐसा सतगुरू मिल गया है जिसने शरीर के अष्ट कमलों का छेदन कर
 दशम द्वार के मार्ग अगमभूमि का भेद बता दिया है। जिस कारण हमने 
उस उतम लोक को देख लिया है।

गरीबपट्टन घाट लखाईयाअगम भूमि का भेव।
ऐसा सतगुरू हम मिल्याअष्ट कमल दल सेव ।।66।।
हमें ऐसा सतगुरू मिल गया है जिसने शरीर के अष्ट कमलों का छेदन कर
 दशम द्वार के मार्ग अगमभूमि का भेद बता दिया है। जिस कारण हमने
 उस उतम लोक को देख लिया है।

गरीबप्रपट्टन की पीठ में सतगुरू ले गया मोहि।
सिर साटे सौदा हुआअगली पिछली खोहि ।।67।।
सतगुरू जी मुझे प्रपट्टन (उतम नगर) के पीठ (बाजार) में ले गए। उस बाज़ार 
में मेरे सिर का सौदा हो गया। सिर के सौदे से अगले-पिछले सारे कर्म नष्ट 
हो गए और मैं मोक्ष का अधिकारी बन गया।

गरीबप्रपट्टन की पीठ मेंसतगुरू लें गया साथ।
जहां हीरे मानिक बिकंैपारस लाग्या हाथ ।।68।।
महाराज जी कहते हैं कि उस उतम लोक के बाजार में सतगुरू देव जी मुझे 
अपने साथ ले गएजहां हीरे और माणिक (ज्ञानविवक) बिक रहे थे। हमें सिर
 के बदले में पारस हाथ लग गया अर्थात् उस सौदे ने हमें जीव से ब्रह्म बना दिया।

गरीबप्रपट्टन की पीठ मेंहै सतगुरू की हाट।
जहां हीरे मानिक बिकैंसौदागर स्यूं साट ।।69।।
उस उतम नगर के बाज़ार में सतगुरू जी की दुकान लगी हुई है। उस दुकान में नाम
 और प्रेम रूपी हीरे मोती बिकते हैं। जीव रूपी सौदागर अपने सिर के
 बदले में उसका सौदा करते हैं।

गरीबप्रपट्टन की पीठ मेंसौदा है निज सार।
हम कूँ सतगुरू ले गयाऔघट घाट उतार ।।70।।
उस उतम लोक के बाजार में आत्मतत्व की प्राप्ति रूपी सार सौदा बिकता है। हमें
 सतगुरू देव जी कठिन रास्ते में से बड़ी आसानी से पार ले गए। अर्थात् हमें 
सतगुरू देव जी की कृपा से आत्म साक्षात्कार हो गया।

गरीबप्रपट्टन की पीठ मेंप्रेम प्याले खूब।
जहां हम सतगुरू ले गयामतवाला महबूब ।।71।।
उस उतम लोक के बाज़ार में अमृत के बहुत प्याले भरे हुए हैंजिन्हें पी कर प्रभु का 
प्यार मन में जग जाता है। उतम लोक के दरबार में हमारा
 मतवाला महबूब सतगुरू हमें ले गया।

गरीबप्रपट्टन की पीठ मेंमतवाले मस्तान।
हम कूँ सतगुरू ले गयाअमरापुर अस्थान ।।72।।
उस उतम नगर के बाजार में प्रेम के प्याले पीकर प्राणी मस्त होकर झूम रहे हैं। हमारा 
सतगुरू हमें ऐसे ही अमरापुरी स्थान में ले गया। सतगुरू गरीबदास महाराज
 जी आगे की छः साखियों में आन्तरिक योग लिया का वर्णन करते हैं

गरीबबंकनाल के अंतरेत्रिवैणी के तीर।
मानसरोवर हंस हैबानी कोकिल कीर ।।73।।
बंकनाल (टेढ़ी नाड़ी) अर्थात् मेरूदण्ड नाड़ी के भीतर और त्रिवेणी (इलापिंगलासुष्मना)
 के किनारे जब जिज्ञासू साधक की सुर्ति और प्राण स्थिर होते हैंत्रिकुटी रूपी
 मानसरोवर के किनारे जब जीव रूपी हंस पहंचता है उस स्थान पर कोयल
 और तोते आदि पक्षियों की आवाज जैसी प्यारी वाणी सुनाई देती है।

गरीबबंकनाल के अंतरेत्रिवैणी के तीर ।
जहां हम सतगुरू ले गयाचुवै अमीरस छीर ।।74।।
सतगुरू देव जी हमें बंकनाल के अंदर और त्रिवेणी के तट पर ले गए
 जहां सदैव अमृत रस टपकता है।

गरीबबंकनाल के अंतरेत्रिवैणी के तीर ।
जहंा हम सतगुरू ले गयाबन्दीछोड़ कबीर ।।75।।
बन्दीछोड़ गरीबदास साहिब जी कहते हैं कि सतगुरू बंदीछोड़ कबीर साहिब जी हमें 
बंकनाल के अंदर और त्रिवेणी के तट पर ले गए जहां सदैव अमृत रस टपकता है।

गरीबभँवर गुफा में बैठ करिअभी महारस जोख।
ऐसा सतगुरू मिल गयासौदा रोकम रोक ।।76।।
हमें ऐसा सतगुरू मिल गया है जो भंवर गुफा में बैठकर अमृतरस तौल रहा है। जिस
अमृत को पीकर प्राणी का जन्म-मरण कट जाता है। इस अमृत का सौदाजो कि
 सिर के बदले में मिलता हैयह नगद का सौदा है इसमें उधार नहीं है।

गरीबभँवर गुफा में बैठ करिअमी महारस तोल।
ऐसा सतगुरू मिल गयाबजर पौलि दई खोल ।।77।।
हमें ऐसे सतगुरू मिल गए हैं जिन्होंने दशम द्वार के सख्त किवाड़ खोल दिए हैं।
 उस भंवर गुफा में बैठकर सतगुरू अमृत महारस तोलते हैं भाव 
प्राण-आत्मा को अमृत महारस पिलाते हैं।

गरीबभँवर गुफा में बैठ करिअमी महारस जोख।
ऐसा सतगुरू मिल गयाले गया हम परलोक ।।78।।
भंवर गुफा (दशम द्वार) में बैठकर सतगुरू जी अमृत रस तौल रहे हैं ऐसे सतगुरू 
हमें मिल गए जो हमें उतम लोक (सत्यलोक) में ले गए हैं।

गरीबपिंड ब्रह्मंड से अगम हैन्यारी सिन्धु समाधि।
ऐसा सतगुरू मिल गयादेख्या अगम अगाध ।।79।।
महाराज जी कहते हैं कि सुरति और शब्द का मिलापजिसके द्वारा समाधि लगती है
वह शरीर और संसार से परे है। हमें ऐसे सतगुरू मिल गए हैं जिनकी कृपा
 से हम अगम-अगाध प्रभु को देख लिया है।

गरीबपिंड ब्रह्मंड से अगम हैन्यारी सिन्धु समाधि।
ऐसा सतगुरू मिल गयादिया अखै प्रसाद ।।80।।
सुरति शब्द के योग से समाधि लगती हैवह शरीर और संसार से परे है। हमें ऐसे
 सतगुरू मिल गए हैं जिन्होंने मोक्ष पद रूपी कभी भी समाप्त न होने वाला
 प्रशाद हमें दिया है।

गरीबऔघट घाटी ऊतरेसतगुरू के उपदेश।
पूर्ण पद प्रकाशियाज्ञान जोग प्रवेश।।81।।
सतगुरू जी के उपदेश से हमने दुर्गम घाटी को पार कर लिया है। सतगुरू देव जी
 के उपदेश रूपी ज्ञान योग से हमारे मन में पूर्ण पारब्रह्म 
का प्रकाश हमें दिखाई दे रहा है।

गरीबसुन्न सरोवर हंस मनन्हाया सतगुरू भेद।
सुरति निरति परचा भयाअष्ट कमल दल छेद।।82।।
सुन्न मण्डल में जो अमृत सरोवर हैउसमें हमारे हंस रूपी मन ने सतगुरू द्वारा 
बताई गई युक्ति के साथ स्नान किया है। शरीर के आठों कमलों का छेदन 
करके ही सुरति-निरत द्वारा पारब्रह्म का दर्शन पाया जाता है।

गरीबसुंनि बेसुंनि से अगम हैपिंड ब्रह्मंड से न्यार।
शब्द समाना शब्द मेंअविगत वार न पार ।।83।।
वह पारब्रह्म प्रभु सुन्न और बेसुन्न से भी परे है। शरीर और संसार से भी न्यारा है। 
शब्द भी शब्द में समा जाता है परन्तु अविगत पुरूष का 
कोई पार नहीं है। शब्द से भी परे है।

गरीबसतगुरू कूं कुरबान जांअजब लखाया देश।
पार ब्रह्म प्रवान हैनिरालंभ निज नेश ।।84।।
मैं ऐसे सतगुरू से कुर्बान जाता हूं जिसने कृपा करके मुझे निराला ही देश दिखा दिया है। 
जहां पारब्रह्म प्रभु बिना आधार के अपने आप में लीन होकर बिराज रहे हैं।

गरीबसतगुरू सोहं नाम देगुझ बीरज विस्तार।
बिन सोहं सीझै नहीमूल मंत्र निज सार ।।85।।
सतगुरू देव जी ही जिज्ञासु को एक गुप्त मंत्र समझाते हैं कि हे हंस! यही मूल
 मंत्र सार है। इस सोहं को समझे बिना आत्म तत्व की प्राप्ति नहीं हो सकती।
 यह सिर्फ गुरू के द्वारा ही समझा जा सकता है।

गरीबसोहं सोहं धुन लगैदर्द बन्द दिल माहिं।
सतगुरू परदा खोल्हींपरा लोक ले जाहिं ।।86।।
बन्दीछोड़ गरीबदास साहिब जी कहते हैं कि गुरूमुख से सुनकर जिसके दिल
 में सोहं-सोहं की धुनि लग जाती है और प्रभु को मिलने का दिल में दर्द पैदा 
हो जाता है। ऐसे प्रेमी सेवक के लिए सतगुरू परलोक जाने का द्वार खोल देते
 हैं अर्थात् ऐसा नाम का जप करने वाला सेवक सतगुरू के लोक में पहुंच जाता है।

गरीबसोहं जाप अजाप हैबिन रसना होई धुन्न। 
चढे महल सुख सेज परजहां पाप नही पुन्न।।87।।
सोहं बीज मंत्र का जाप अजपा जाप है अर्थात्इसे जपने हेतु जिह्वा हिलाने की
 ज़रूरत नहीं पड़ती। यह स्वास की गति द्वारा सुर्ति की धुनि से जपा जाता है।
 ऐसा अजपा जप करने वाला हंस सुख सागर के महल में पहुंच जाता है जहां न
 कोई पाप है न कोई पुण्य है अर्थात् मुक्त लोक है।

गरीबसोहं जाप अजाप हैबिन रसना होइ धुन्न।
सतगुरू दीप समीप हैनहीं बस्ती नही सुन्न ।।88।।
सोहं बीज मंत्र अजपा जाप है जो बिना रसना के सुर्ति की धुनि से चलता है। ऐसा
 सुमिरन करने वाले के लिए सतगुरू का स्थान अत्याधिक नज़दीक है। जहां न कोई 
बसती और न ही कोई उजाड़ है अर्थात् वह स्थान ब्रह्मलोक या सत्यलोक है। जो
 इस सुमिरन के जाप से प्राप्त होता है।

गरीबसुन्न बसती से रहित हैमूल मंत्र मन माहिं।
जहां हम सतगुरू ले गयाअगम भूमि सत ठाहिं ।।89।।
सतगुरू देव प्रभु परमात्मा सुन्न और बसती दोनों से अलग है। मूल मंत्र अंतरात्मा
 में समाया हुआ है। अंतरात्मा ही पारब्रह्म का स्वरूप है। हमारे सतगुरू
 हमें ऐसे ही पारब्रह्म के सत्यलोक में ले गए हैं।

गरीबमूल मंत्र निज नाम हैसुरति सिंध के तीर।
गैबी बानी अरस मेंसुर नर धरैं न धीर।।90।।
पारब्रह्म प्रभु का नाम ही मूलमंत्र हैजो सुर्ति शब्द के घाट पर है। सुर्ति शब्द के मूल
 से जो प्राणात्मा में से दिव्य वाणी प्रकट होती है उसे सुन कर देवता और मनुष्य 
भी धीरज धारण नहीं करते और कोई सतगुरू का प्यारा पक्का साधक ही उसे सुन सकता है।

गरीबअजब नगर में ले गयाहम कूं सतगुरू आन।
झलकै बिंब अगाध गतिसूते चादर तान ।।91।।
सतगुरू देव जी हमें मृत्य लोक से अजब नगर में ले गए। जहां का नज़ारा अद्भुत है। 
वहा ह्म तेज पुण्ज के प्रकाश से झिलमिल-झिलमिल हो रही है। हम उस नज़ारे को देखकर 
वहां चादर ओढ़ कर सो गए अर्थात् उस ब्रह्म लोक
के आनन्द में लीन हो गए।

गरीबअगम अनाहद द्वीप हैअगम अनाहद लोक।
अगम अनाहद गवन हैअगम अनाहद मोख ।।92।।
वह ब्रह्मलोक ऐसा द्वीप है जो अगम अनहद उस लोक की महिमा को जाना नहीं
 जा सकता। वहां का मार्ग भी अगम-अनाहद है और मोक्ष भी अगम अनाहद है।

गरीबसतगुरू पारस रूप हैंहमरी लोहा जात।
पलक बीच कंचन करैंपलटैं पिंड रू गात।।93।।
सतगुरू देव जी का उपदेश पारस रूप है। हमारा दिल लोहे की तरह कठोर है।
 सतगुरू का उपदेश पारस रूप जब हमारे दिल में धारण होता
 है तो एक पलक में यह सोने की तरह शुद्ध बन जाता है अर्थात् मुक्ति
 का अधिकारी बन जाता है। सतगुरू के उपदेश से प्राणी का जीवन पलट जाता है।

गरीबहम तो लोहा कठिन हैसतगुरू बने लुहार।
जुगन जुगन के मोरचेतोड़ घड़े धणसार ।।94।।
सतगुरू जी कहते हैं कि हमारा दिल कठोर लोहे की तरह है जिसे जंग रूपी मैल लगी 
हुई है। सतगुरू जी ऐसे कुशल लोहार हैं जो हमारे मन को उपदेश से शुव करते हैं 
और युगों-युगों से मन पर जमी हुई मैल को अपने उपदेश से दूर कर देते हैं। 
सतगुरू जी का उपदेश प्राणी के मन को सोने की तरह शुव बना देता है।


गरीबहम पशुवा जन जीव हैंसतगुरू जाति भृंग।
मुरदे से जिंदा करैपलट धरत हैं अंग ।।95।।
हम पशु समान अज्ञानी जीवकीट-पतंगे की मानिन्द हैं। सतगुरू जी का स्वभाव 
भंृगी जैसा है। जैसे भृंगी छोटे कीट-पतंगों को पकड़ कर अपने घर में बंद करके
 उन्हें अपनी भिन्न-भिन्नाहट सुनाकर भृंगी ही बना लेती है। इसी तरह सतगुरू 
अपने उपदेश से अज्ञानी जीव को अपने जैसा बना लेते हैं। जिस तरह भृंगी 
मरणासन्न कीट-पतंगों के अंगों को पलटकर अपना रूप दे देती है। इसी प्रकार 
सतगुरू जी का भी ऐसा ही स्वभाव है। वह अपने सेवक
 को अपने जैसा ही बना लेते हैं।

गरीबसतगुरू सिकलीगर बनेयौह तन तेगा देह। 
जुगन जुगन के मोरचेखोवै भ्रम संदेह ।।96।।
सतगुरू लोहार जैसे हैं हमारा शरीर तलवार के लोहे जैसा है। जिस तरह लुहार तलवार
 के लोहे को सान पर चढ़ा कर चमका देता है और उसके उपर से सारा जंग उतार
 देता हैइसी तरह सतगुरू जी उपदेश और अपनी कृपा दृष्टि द्वारा
 सेवक के मन को शुद्ध कर देते हैं।

गरीबसतगुरू कंद कपूर हैहमरी तुनका देह।
स्वांति सीप का मेल हैचन्द चकोरा नेह ।।97।।
सतगुरू जी केले में कपूर की तरह है और हमारी देह केले के पत्ते के समान है। जिस
 तरह केले में कपूर हल्का और शुव होता है इसी तरह सतगुरू जी का शुव स्वरूप है। 
जिस तरह स्वाति नक्षत्र में सीप में बूंद के पड़ने से मोती पैदा हो जाता है इसी
 तरह सतगुरू के मिलाप से प्रभु प्रकट हो जाते हैं। जिस तरह चकौर पक्षी का 
चंद्रमा से प्यार है इसी तरह का प्रेम होने से
 ही सतगुरू प्राणी को मिलते हैं।

गरीबऐसा सतगुरू सेईयेबेग उधारे हंसं।
भौसागर आवै नहींजौरा काल विधंस ।।98।।
ऐसे समर्थ सतगुरू की सेवा और उपासना करनी चाहिए जो जीवात्मा का तुरन्त उदार 
कर दे। फिर वह जीवात्मा भवसागर में बार-बार न आए। यम और मृत्यु
 उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके।

गरीबपट्टन नगरी घर करैगगन मंडल गैनार।
अलल पंख ज्यूं संचरेसतगुरू अधम उधार ।।99।।
ऐसे समर्थ सतगुरू की शरण लेनी चाहिए जो अललपक्षी की तरह गगन मण्डल में 
अर्थात् उतम नगरी में रहता है और नीच (महापापी) का भी उद्धार करने में समर्थ है।

गरीबअलल पंख अनुराग हैसुन्न मंडल रहैं थीर।
दासगरीब उधारियासतगुरू मिले कबीर ।।100।।
बन्दीछोड़ गरीबदास साहिब जी कहते हैं कि सतगुरू जी का अपने हंसों के साथ इसी तरह
 का प्रेम है जिस तरह अललपक्षी का अपने बच्चे के साथ प्रेम होता है। ऐसे सतगुरू 
जी कबीर साहिब महाराज जी हमें मिले हैं जो सुन्न मण्डल में रहते हैं। उन्होंने 
अपने प्रेम के बल से हमारा उवार किया है।


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